Tuesday, 9 May 2017

बाहुबली के बहाने

बाहुबली देखी। मुझे लगता है यह यश चोपड़ाओं, करन जौहरों, सूरज बड़जात्याओं, महेश भट्‌टों अौर सुभाष घइयों की हिम्मत और हैसियत के बाहर का फिल्मांकन है। बेमतलब लव स्टोरी, बकवास फैमिली ड्रामे और बेहूदी कहानियों पर कूड़ा मनोरंजन परोसने वाले हिंदी सिनेमा के समकालीन बड़े नाम वाले सस्ते फिल्म मेकर्स की समूची क्षमता के बाहर की बात थी-बाहुबली। महान कल्पनाशीलता से भव्यता के चरम को बड़े परदे पर रचने वाली यह कृति दक्षिण भारतीयों के बूते की ही बात थी। जिन्होंने कर्नाटक में महान विजयनगर साम्राज्य के खंडहर देखे हैं, उन्हें बाहुबली का कोई भी विराट दृश्य चौंकाएगा नहीं। 
 
बेल्लारी के पास हम्पी में पांच सौ साल पहले का यह साम्राज्य अंतिम हिंदू साम्राज्य के रूप में याद किया जाता है, जिसने भारत की भव्यता के सबसे ताजा और जानदार नमूने रचे। सिर्फ सवा दो साल यह शहर जीया और तालिकोट की प्रसिद्ध लड़ाई में पांच बहमनी सुलतान बहेलियों ने मिलकर इसे मिट्‌टी में मिला दिया। पुर्तगाली और अंग्रेज रिसर्चरों-लेखकों ने इसके हैरतअंगेज विवरण लिखे हैं। दक्षिण के वैभव को आंध्रप्रदेश में तिरुपति, तमिलनाडु मंे तंजौर, कर्नाटक में मैसूर, केरल में पद्मनाभ स्वामी टेंपल और तेलंगाना में निजाम के किस्सों में देखा-सुना जा सकता है।
दक्षिण में विकसित और बचे रह गए आर्ट, कल्चर, आर्किटेक्ट, म्युजिक, डांस की मालामाल परंपरा के सबूतों की कोई तुलना उत्तर भारत से नहीं हो सकती। उत्तर भारत में दसवीं सदी के बाद इतिहास पर छाया गहरा अंधेरा है और उसमें से निकले अवशेषों पर हम आज के धुंधले से भारत को देखते हैं। दक्षिण भारत ही वह जगह है, जहां भारत की पौराणिक सुगंध अब तक हवाओं में है। प्राचीन भारत की महानता के जिंदा सबूत दक्षिण के चप्पे-चप्पे में हैं। देश के नक्शे पर उत्तर और मध्य में भारत गौड़, नालंदा, विक्रमशिला, अयोध्या, मथ्ुरा, वाराणसी, दिल्ली, अजमेर, विदिशा, धार, मांडू, देवगिरि तक के खंडहरों में अपनी क्षत-विक्षत स्मृतियों में आहत और धूलधूसरित है। इतिहास की यात्रा में ये पड़ाव भारत को सदियों तक धुएं और राख में धकेलने वाले रहे हैं। अल्लाह का शुक्र है कि दक्षिण में काफी कुछ साबुत बचा रह गया।

सोने के प्रति दक्षिण के लोगों में गजब का लगाव है। विवाह में गरीब घर में भी दस-बीस तौला सोना चढ़ता ही है। हर पांचवा होर्डिंग वहां किसी आभूषण वाले का ही दिखाई देगा। आभूषणों का कारोबार हमारे परंपरागत सराफे के कारोबारियों जैसे नहीं, बल्कि बड़े मॉल जैसे हैं,जिसकी एक फ्लोर पर सिर्फ चांदी, दूसरी पर सोना और ऊपर हीरे-जवाहरात के जेवर जाकर पसंद कीजिए। बड़े ब्रांड, जो दक्षिण के हर शहर में हैं। अब आप बाहुबली के किरदारों के सिर्फ आभूषण ही गौर से देखिए। शायद उत्तर वालों के लिए यह सामान्य ज्ञान हो कि शरीर की शोभा के लिए स्वर्ण के किस-किस आकार-प्रकार के आभूषणों की कल्पना हमारे सौंदर्य शास्त्रियों ने कभी की होगी।
विजयनगर के खंडहर हो चुके मंदिरों में पांच सौ साल पहले के समृद्ध भारतीय जनजीवन की ऐसी ही अनगिनत तस्वीरें पत्थरों पर खुदी हैं। महान कृष्णदेव राय के समय का विजयनगर बाहुबली की माहिष्मती से कहीं कम नहीं था। तुंगभद्रा नदी के किनारे फैले उसके खंडहर आज भी अपने शानदार वैभव की गवाही दुनिया को देते हैं। सब कुछ हैरतअंगेज सा है। परदे पर लगता है कि कृष्णदेव राय के विजयनगर में फिल्मांकन हो रहा हो।

एक हजार साल पहले तंजौर में राजा राजा ने बिग टेम्पल के रूप में वही आश्चर्य रचा था, जो राजामौलि ने सिनेमा के परदे पर रचा। आर्किटेक्ट का ऐसा नायाब नमूना, जिसे देखने दुनिया भर के इतिहासप्रेमी यहां आकर दांतों तले उंगलियां दबा लेते हैं। 2010 में करुणानिधि ने उसका एक हजार सालवां जलसा मनाया था। बाहुबली में राजमाता द्वारा भेजे गए विवाह प्रस्ताव के साथ स्वर्ण उपहारों की झलक ने याद दिलाया कि कृष्णदेव राय विजयनगर से सात बार तिरुपति आए थे और स्वर्णदान के प्रसंग इतिहास में अंकित हो गए। भगवान वेंकटेश के शिखर पर मढ़ा सोना राजा कृष्णदेव राय के दान में मिले सोने को गला कर ही मिला था। दक्षिण भारतीय भाषाओं में राजा कृष्णदेव राय पर अनगिनत फिल्में बनी हैं।
तमिलनाडु में सिने सितारों की हैसियत हम जानते हैं। रजनीकांत की लोकप्रियता अमिताभ से हजारों गुना ज्यादा है। उत्तर भारत में जब दीपावली के दिन लोग घरों में लक्ष्मी पूजा की सजावट को अंतिम रूप देने में व्यस्त होते हैं तब तमिलनाडु में लोग नए कपड़े पहनकर अपने दोस्त-परिजनों के साथ उस दिन रिलीज हुई फिल्में देखते हैं। घरों से ज्यादा रौनक उस दिन सिनेमाघरों की होती है, जब महंगे बजट की मेगा फिल्में दीपावली पर परदे पर आती हैं। करुणानिधि, एमजी रामचंद्रन, जयललिता, विजयकांत, एनटी रामाराव जैसी सिनेमा जगत की हस्तियाें को वहां के अवाम ने राजनीति में भी महानायक बनने का मौका दिया। हमारे यहां भी अमिताभ, विनोद खन्ना, शत्रुध्न सिन्हा, हेमा मालिनी, जया प्रदा, जया बच्चन जैसे किरदार सियासत में आए। कौन कहां है देख लीजिए।
हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि राम या कृष्ण के समय भारत कैसा रहा होगा? बाहुबली की कहानी काल्पनिक हो सकती है किंतु चकाचौंध कर देने वाली पृष्ठभूमि और दृश्यों में उसे रचा गया है, उसने भारत के सनातन स्वरूप की एक झलक ही दिखाई है। इस लिहाज से कुछ भी काल्पनिक नहीं है। अगर बाहुबली नहीं देखी है तो नहाना-धोना बाद में पहले देख आइए। इसके बाद कभी दक्षिण भारत की यात्रा का लंबा प्लान बनाइए।
दक्षिण में दीवानगी सिर चढ़कर बोलती है।


Friday, 7 April 2017

मोरारी बापू और राम का तलगाजरडा

चैत्र नवरात्र के नौ दिन दिन तक पूरे समय मोरारी बापू की राम कथा सुनी। कल कथा की पूर्णाहुति थी। मेरी मां उन्हें नियमित सुनती थीं। कथा कहीं भी हो टीवी चैनल पर वे पूरे भक्तिभाव से सुना करती थीं। 2013 मंे वे इंदौर आए थे। तब मां को उन्हें सुनते हुए मैंने कुछ टुकड़े मोबाइल में रिकाॅर्ड किए थे। उनके साथ टुकड़ों-टुकड़ों में कथा के कुछ हिस्से मैंने भी अक्सर सुने। इस बार भोपाल में उनके आने का निमित्त बना और संयोग से मुझे भी मुक्त मन से सुबह नौ से दोपहर डेढ़ बजे तक सीधे सुनने का अवसर मिल गया। एक अच्छे अनुभव से गुजरा।
बापू हर बार अपनी कथा के लिए मानस का कोई एक प्रसंग या पात्र ले लेते हैं और फिर पूरे नौ दिन की कथा भारत की महान पौराणिक गाथाओं से गुजरती हुई उसी पात्र या प्रसंग के आसपास घूमती है। भोपाल में उन्होंने मानस विष्णु को अपना विषय के रूप में चुना। रामचरित मानस में विष्णु पर जो कुछ तुलसीदास ने कहा है, उसका वर्णन। भगवान राम विष्णु के अवतार थे या राम से विष्णु का अवतरण है? बापू कहते हैं कि राम ही परम तत्व हैं। उनसे कई विष्णु अवतरित हैं। 
 लगभग चार घंटे की बैठक मंे मोरारी बापू का उदबोधन आपसी संवाद की शैली में बमुश्किल देा से ढाई घंटा होता है। बाकी समय में मानस की चौपाइयों का कीर्तन, राम भजन। ढाई घंटे में भी कभी तीस-चालीस मिनट श्रोताओं की चिटि्ठयों पर चर्चा, पंद्रह-बीस मिनट कोई गीत, शायरी। बीच-बीच में राम का आवागमन हैं। कभी शिव और पार्वती के कथा प्रसंग, कभी विष्णु के वैभव की चर्चा और कभी महाभारत के रोचक किस्सों में कृष्ण पर बात।  
शुरू के दो दिन एक शब्द मैंने बार-बार सुना लेकिन समझा नहीं कि इसका अर्थ क्या है? वह शब्द था-तलगाजरडा। किसी भी बात पर बापू कहते-अपनी तलगाजरडा समझ मंे तो यह ऐसा है। तलगाजरडा परंपरा में यह ऐसा नहीं है। मैं समझा कि वे किसी गुजराती विषय से जोड़ रहे हैं। तीसरे दिन मैंने उनकी वेबसाइट देखी। पता चला कि तलगाजरडा उनका पैतृक गांव है। गुजरात के भावनगर जिले में महुआ तहसील का एक गांव, जहां शिवरात्रि के दिन 1947 में मोरारी बापू का जन्म हुआ। अपने गांव का नाम उन्होंने हर दिन किसी न किसी संदर्भ में लिया ही। जैसे तलगाजरडा के राम मंदिर मंे जो शिवलिंग है, एक दिन बापू ने उसका नामकरण किया-जीवनेश्वर महादेव। आज से तलगाजरडा के राम मंदिर के शिव का नाम जीवनेश्वर महादेव।

बीच कथा में बापू भावुक होकर कहते-मैं तुलसी का गुलाम हूं। अपनी जुबान को बेच दिया साहब! तुलसी और राम के प्रसंगों में कई बार उनकी आंखें छलछलाती। रामकथा का यह कर्णप्रिय गायक आत्मा की गहराई से बोलता महसूस होता। उनके कीर्तन पर झूमने के लिए श्रोता तैयार ही बैठे रहते। वे किसी विद्वान के वक्तव्य को अपनी कथा में लेते तो बड़ी ईमानदारी से स्वीकार करते कि यह जे. कृष्णमूर्ति का कहा हुआ है अौर यह ओशो ने कहा। ओशो का जिक्र तो हर दिन ही हुआ। वे कहते कि भागवत और रामकथा के वक्ताओं को यह सच सामने रखना चाहिए कि वे जिस किसी विद्वान की बात अपने प्रवचन में ले रहे हैं, उसके नाम का उल्लेख भी किया जाए। बापू कहते-यह ऋण है उन महापुरुषों का।
आत्मा के रस से सराबोर उनकी वाणी मधुर है। भारतीय जनमानस में राम की प्रतिष्ठा भी अदभुत है। तुलसीदास ने रामचरित मानस के जरिए राम की कथा को श्लोक से लोक में उतार दिया। संवत् 1631 में रामनवमी के ही दिन तुलसी ने अयोध्या में रामचरित मानस की रचना की। बापू ने बताया कि उस दिन लगन भी वही था, जो राम के जन्म के दिन चैत्र नवरात्र शुक्ल पक्ष की नवमी को था। किसी ईश्वरीय योग से ही तुलसी एक ऐसे समय प्रकट हुए, जब भारत दमन के अंधेरे में गुम था। वह अकबर की हुकूमत का समय था, जब माना जाता है कि मुस्लिम शासन के भयावह दौर मेंेे भारतीयों को कुछ समय की राहत नसीब हुई थी।
 बापू ने एक दिन अयोध्या में कथा की इच्छा प्रकट की। वे मानस गणिका पर कथा करना चाहते हैं। रामचरित मानस में गणिका के प्रसंग और पात्र पर। एक गणिका का किस्सा भी उन्होंने सुनाया-वासंती नाम की एक गणिका अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में अवध में जाकर बसी। उसे तुलसी की कामना है। परम बैरागी तुलसी अवध की गलियों से गुजरते हैं। वह तुलसी की माला जप रही है। किसी ने गोस्वामी से कहा-वह आपका नाम रट रही है। पहले दुनिया को रिझाया। अब रघुनाथ को रिझाने आई है। मानस का तुलसी उससे मिलने जाता है। गणिका का दर्शन देने। वह उठने की कोशिश करती है। गोस्वामी निकट आए। वासंती के हाथ कांप रहे हैं। तुलसी के चरण स्पर्श करते हैं। वह बोलने की कोशिश करती है। बाबा के चरण उसके निकट आए। बाबा ने चरणों का दान वासंती को किया। दोनों हाथ उसके चरणों पर हैं। गोस्वामी उसके सिर पर हाथ रखते हैं-कुछ कहना है वासंती? वह बोली-एक बार आपके मुख से राम का गुणगान सुनना चाहती हूं। तुलसी गाते हैं-श्रीरामचंद्र कृपालु भजमन...। यह पद पूरा होता है और उधर वासंती अस्तित्व में लीन हो जाती है। तुलसी का वासंती के पास जाने का संदेश है कि समाज को वहां जाना चाहिए, जहां कोई नहीं जाता। मैं अयोध्या में मानस गणिका पर कथा कहना चाहता हूं।
हर दिन उनके पास श्रोताओं के प्रश्नों की संख्या बढ़ती रही। मेरा एक सवाल था-अयोध्या में राम अपने जन्मस्थान से विस्थापित हैं। यह एक उलझन बनी हुई है। आप कई शायरों के साथ मिलते-बैठते हैं। कभी इस मसले पर कोई चर्चा हुई? बापू ने कोई उत्तर नहीं दिया। हर दिन तलगाजरडा का उल्लेख सुनने के बाद मैंने उन्हें फिर से लिखा-बापू, आप हर िदन तलगाजरडा का जिक्र करते हैं। आपकी महानता है कि आप इतनी विनम्रता से स्वयं को तुलसी का गुलाम कहने का साहस करते हैं। मगर तुलसी के भी मालिक हैं राम और अयोध्या उनकी तलगाजरडा है। उनका जन्म स्थान। लेकिन राम अपनी जन्मभूमि में बेदखल हैं। एक बदशक्ल टेंट में पनाह लिए हैं, जिनकी कथा आपसे सुनकर लाखों श्रोता श्रद्धा से भर जाते हैं। कभी राम के तलगाजरडा पर भी कुछ कहिए। दो शब्द!
मैंने दो दिन तक एक कागज पर घुमा-फिराकर यह प्रश्ननुमा जिज्ञासा उनके समक्ष भेजी। उन्होंने दूसरे कई ऐसे प्रश्न ही लिए जिनके विषय जीवन से जुड़े थे। कोई दुखी है। कोई निराश है। किसी ने कथा में कोई संकल्प ले लिया। शिव, विष्णु या राम से जुड़ा कोई प्रश्न। संभव है मेरी तरह और मानसप्रेमियों ने भी वर्तमान के कुछ प्रश्न लिख भेजे हों। लेकिन उन्होंने ऐसा कोई सवाल नहीं उठाया। आखिरी दिन कथा की पूर्णाहुति पर जब राम अयोध्या लौटे और एक व्यक्ति के संदेह पर सीता को निकाला गया तब बापू ने कहा कि तुलसी रामचरित मानस में इस प्रसंग की चर्चा नहीं करते। तुलसी क्या इशारा कर रहे हैं? तुलसी विवादों से बचना चाहते हैं। वे संवाद चाहते हैं, विवाद नहीं। सीता का त्याग एक विवादास्पद प्रसंग है। तुलसी अपने मानस में इससे बचे।
मुझे लगा कि बापू का इशारा ऐसे सब सवालों की तरफ था, जो हमारे सामने हैं। आज की अयोध्या में एक फटेहाल टेंट में विराजित राम का प्रश्न। एक हजार साल के दमन के दाैर में आहत सभ्यता के बेचैन कर देने वाले अनगिनत सवाल। सत्तर साल से सेकुलर सिस्टम में पनपी गाजरघास में घुमड़ते सवाल। नौ दिन में उन्होंने अपनी ओर से कभी कलयुग के भारत काे शायद ही स्पर्श किया हो। किसी ने उस दिशा में मोड़ने की कोशिश सवालों के जरिए की भी हो तो वे बचकर निकले।
मैं कई बार अयोध्या गया हूं। करोड़ों भारतीयों के आराध्य भगवान राम को उस टेंट में देखना वाकई एक तकलीफदेह अनुभव की तरह रहा। मैंने बापू को उसी भावुक धरातल पर पूरी श्रद्धा से सुना। त्रेतायुग में जगमगाते राम उनकी कथाओं का केंद्र हैं। तुलसी भी, जिन्होंने लोकभाषा में राम की कथा कही और भारतीयों के अंतस में उतार दी। हजार साल के मुस्लिमकाल में हजारों मंदिर ध्वस्त किए गए। अकेले एक निहत्थे तुलसी की एक कविता ने राम की प्रतिष्ठा पीढ़ियों के मानस में कर दी। 
 
बापू के वचन त्रेतायुग की चमकदार अयोध्या की झिलमिलाती झांकी से होकर तुलसी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर ही केंद्रित रहे। मुझे आज की उजाड़ अयोध्या रोज ही याद आती रही। बापू वहां तक भूलकर भी आए नहीं। राम के तलगाजरडा पर बोलना एक सर्वमान्य और विश्वप्रसिद्ध वक्ता के लिए नुकसानदेह हो सकता है। सहज और संतुलित वक्ता की छवि टूट सकती है, क्योंकि अाज की अयोेध्या पर आप क्या कहेंगे? मंदिर का उल्लेख किए बिना कैसे रहेंगे। इसलिए बेहतर है कि अच्छे शायरों के कलाम सुनाए जाएं, अल्लाह, पैगंबर,जीसस, निजामुद्दीन औलिया और अमीर खुसरो के किस्सों के सहारे थोड़ा व्यापक हो लिया जाए, दार्शनिक अर्थ देने वाले फिल्मों के चुनिंदा गीतों को गा लिया जाए। मानस के विष्णु का एक अर्थ यह भी है-जो व्यापक हो, विशाल हो। आकाश भी जिसमें समा जाए। मानस विष्णु ही उनका इस कथा में केंद्रीय विषय था।

Tuesday, 21 February 2017

मेरा राष्ट्रवाद

  भारत एक राष्ट्र के रूप में मुझे गर्व से भरता है। यह ऐसा देश है, जो अपने हर हिस्से और हर हरकत में बेजोड़ है। मैं खुद को खुशनसीब मानता हूं, जो आजाद भारत में पैदा हुआ। मेरे कई पुरखे गुलाम सदियों की उथल-पुथल में जाने कहां-कहां से बेदखल होते हुए भटके। उनके लिए भारत के क्या मायने रहे होंगे? मगर चार पीढ़ियाें के संघर्ष के बाद आजादी की रोशनी में आए भारत की याददाश्त में हजारों साल पुरानी सभ्यता और संस्कृति के जगमगाते किस्से थे। यह मामूली बात नहीं थी। यह ऐसी विरासत थी, जिसने भारत को भरोसे से भरा। भरोसा इस बात का कि वह किसी से कम नहीं है।
मैं मानता हूं कि राष्ट्रवाद की कोई एक परिभाषा नहीं हो सकती। हरेक के लिए इसके मायने अलग हो सकते हैं। नजरिया दूसरा हो सकता है। मगर मूल में राष्ट्र ही होना चाहिए। यह अनिवार्य शर्त है। निर्विवाद, संदेह और सवालों के परे सिर्फ एक राष्ट्र। भारत ने अपने निकट अतीत मंे जो भोगा है, उसे देखते हुए यह देश हमसे कुछ अतिरिक्त की अपेक्षा करता है। और यह अपेक्षा गैर वाजिब नहीं है। भारत में पैदा होने के कुछ खास मायने हैं। यह धरती के किसी भी हिस्से में पैदा होने जैसा संयाेग नहीं है। चमत्कारिक रूप से इस धरती पर संसार की चंद जीवित और पुरातन परंपराएं जहां बची रह पाईं, उनमें भारत सबसे ऊपर है। भारतीय लोक संस्कृति के प्रसिद्ध अध्येता डॉ. कपिल तिवारी इसे जोर देकर पुरातन की बजाए सनातन कहते हैं। मुझे लगता है यही ज्यादा सही है। हम पुरातन नहीं, सनातन हैं। इसलिए प्रासंगिक हैं।
जिद और झक में नक्शे पर चंद लकीरें खींच देने भर से कोई राष्ट्र नहीं बन जाते। आजादी के साथ हुए बटवारे के बाद हमने यह कहकर संतोष किया कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है। मगर कश्मीर का जो हिस्सा लकीर के उस तरफ है, उसका क्या? इसी लकीर के इस तरफ पंजाब का एक टुकड़ा है और दूसरी तरफ दूसरा, उसका क्या? वे भी तो हजारों साल से उसी पुरातन और सनातन सिलसिले का हिस्सा रहे हैं। आज वे किस राष्ट्र को संबोधित हैं? एक दिन कागजों पर नए नक्शे बन गए। लकीरें खिंच गईं। जमीन पर खूनखराबे और मारकाट मची। एक राष्ट्र खंडित हो गया। दूसरा पैदा हो गया। लेकिन इन सिरफिरी लकीरों से पैदा हुए उस तथाकथित राष्ट्र की क्या गत हुई? वहमी विचार पर जड़ों से उखड़ी एक जमात!
राष्ट्र अपनी गौरवशाली परंपराओं से बनते हैं। इसमें पीढ़ियां लगती हैं। वे जिंदगी को बेहतर, अासान और उद्देश्यपूर्ण बनाने में अपनी सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा लगाती हैं। वे कुछ ऐसा देकर जाती हैं, जो आने वाली नस्लों के लिए प्रेरक, याद करने और गर्व करने लायक हो। वह कुछ भी हो सकता है। मसलन, कोई जीवन और जगत की उलझी हुई पहेली को सुलझाएगा, नई और मौलिक अवधारणाएं देगा। कोई एक का खंडन करेगा, दूसरा विचार पेश करेगा। कोई मनुष्य की चेतना और जीवन स्तर को ऊंचा उठाने की नई-नई तरकीबें खोजेेगा। नए धर्म की नींव रखेगा। नई सोच, नया नजरिया देगा। कोई यादगार कविता लिखेगा। कोई गणित के सूत्र रचेगा। काेई अंतरिक्ष में ताकझांक कर ग्रहों की गणना करेगा तो कोई प्रकृति के प्रश्नों के उत्तर ढूंढेगा। कोई अजंता-एलोरा बनाएगा। कहीं बामियान के पहाड़ों से बुद्ध प्रकट किए जाएंगे। कोई तक्षशिला, नालंदा और विक्रमशिला की नींव रखेगा। कोई कोणार्क और खजुराहो में चौंकाएगा। कहीं कोई चौबीस कैरेट का विजयनगर चमकाएगा। कोई संगीत तो कोई नाटक और नृत्य की विधाएं लेकर आएगा। यह सिलसिला सदियों तक एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलता ही चला जाएगा। अब आप कल्पना कीजिए कि जिस जमीन पर यह होगा, उसकी शक्ल आखिरकार कैसी होगी?
भारत की कहानी में यही सब है और भरपूर है। पांच हजार साल के ज्ञात सिलसिले में हर हुनर के लाजवाब किरदारों की कभी खत्म होने वाली चमकदार कतार, कारनामे और शानदार सबूत हमारे पास हैं। जब अंग्रेज यहां आए तो यही वह चीज थी, जिसने भारत के प्रति चंद जिज्ञासु अफसरों को हैरत से भरा। मैं सर विलियम जाेंस का नाम सबसे ऊपर रखूंगा। बीस-पच्चीस साल के ऐसे युवा अंग्रेज, जो यहां आज के लाटसाबों की तरह ठाट से सिर्फ अफसरी करने नहीं आए थे यहां की आबो-हवा ने उन्हें गजब की रचनात्मक ऊर्जा से भर दिया। उन्हांेने यहां की भाषा सीखी, शास्त्र पढ़े, देश के कोने-कोने में वीरान और उजाड़ खंडहरों की खोज में जिंदगी लगा दी, शिलालेखों में इस देश के वैभवशाली अतीत के मजबूत सबूत ढूंढे, चप्पे-चप्पे में खुदाइयां कीं और नए-नए रहस्य उजागर किए। वे रहस्य जिन पर सदियों की गुलामी की धूल चढ़ी थी। जो हमारी याददाश्त से गुम थे और मूर्खतापूर्ण लगने वाले किस्से कहानियां बनकर रह गए थे।

पूरी उन्नीसवीं सदी ऐसे अनगिनत अंग्रेजों की जबर्दस्त जिज्ञासा और खोज से भरी है, जिसने भारतीयों को भारत का भूला-बिसरा परिचय याद दिलाया अपने अथक परिश्रम और समर्पण से एक साफ-सुथरा आइना हमें दिया, जिसमें हम अपनी शक्ल ढंग से देख सकते थे। वर्ना तब हम सारनाथ के स्तूपों की ईंटें खोदकर वाराणसी में एक नया मोहल्ला बना रहे थे, नालंदा के टीलों पर खैनी खा-चबाकर थूक रहे थे और सांची की महान विरासत को जंगलों में खो चुके थे। ये वो कोशिशें थीं, जिसने आजादी की लड़ाई में दाखिल होने के पहले भारत को भारत याद दिलाया। मैं समझता हूं कि एक बदकिस्मत मुल्क के लिए यह बड़ी सौगात थी। उन अफसरों के योगदान को देखकर मुझे लगता है जैसे हमारे ही पुरखे उनके रूप में लौटकर भारत आए हों, हमें वापस यह बताने के लिए कि बच्चों देखो, भारत क्या है?
उसी दौरान यह देश 90 साल के विकट स्वाधीनता संघर्ष से गुजरा। तब भारत की कोख से कमाल के किरदार पैदा हुए। स्वामी विवेकानंद मुझे सबसे पहले याद रहे हैं, जिन्होंने पश्चिम को सबसे पहले सबसे ऊंचे स्वर में बताया कि भारत और उसकी नियति क्या है? विवेकानंद का तेवर राष्ट्रवाद की सर्वश्रेष्ठ परिभाषा है। उनका हर भाषण, हर उत्तर, हर शब्द एक राष्ट्र के रूप में भारत की कहानी को महान अर्थ देता है। उसकी जरूरतों को बताता है। उसकी अपेक्षाएं उजागर करता है। कमियों को रेखांकित करता है। वे आधुनिक भारत के प्रथम प्रवक्ता हैं, जिन्हें भारत की नियति ने ही एक खास काम के लिए इतिहास के एकदम सही मोड़ पर पैदा किया। वे बहुत थोड़े समय जीए, लेकिन बहुत विराट देकर गए। उनके बिना मेरे राष्ट्र की गौरवशाली कहानी का सबसे चमकदार पन्ना बेरौनक ही रह जाता।
सातवीं से दसवीं सदी में बेरहम अरब और तुर्क हमलावरों के दाखिल होने तक भारत नक्शे पर खिंची रेखाओं की शक्ल में आज जैसा एक स्पष्ट राष्ट्र नहीं था। लेकिन इस भू-भाग की सांस्कृतिक परिभाषा वेदों की ऋचाओं में मौजूद है। 23 सौ साल पहले सिकंदर के हमले के समय तक्षशिला में आचार्य चाणक्य के मन में एक राष्ट्र के रूप में भारत के भविष्य को लेकर ही तो चिंताएं और सवाल कौंधे थे, जो घनानंद की अपमान भरी राजसभा तक उन्हें ले आए थे। राष्ट्र भारत की जागृत चेतना में तब भी मौजूद था। भारत को उसकी महान सांस्कृतिक परंपराओं ने एक रूप दिया था।
राज्य विस्तार के संघर्ष में एक दूसरे से उलझे और लगातार लड़ते रहने वाले शासक भी जीत के बाद सिर्फ संसाधनों पर कब्जे कर अपने अहंकार की तुष्टि करते थे। वे अपनी समान संस्कृति के एक जैसे मान बिंदुओं को कभी नष्ट नहीं करते थे। तो एक तरफ राज्यों की सीमाएं बनती, बिगड़ती रहती थीं और दूसरी तरफ हर राजवंश में कुछ शासक ऐसे भी होते थे, जो कुछ गजब की चीजंे जोड़ जाते थे। और इस तरह हजारों साल की यात्रा में भारत हर रंग-रूप में खिलता-खिलखिलाता रहा। हर पीढ़ी को अपने जीते-जी गर्व करने लायक एक महान विरासत अपने हिस्से में जन्म से मिली।
सातवीं सदी में सिंध और ग्यारहवीं सदी में दिल्ली पर कब्जे के बाद हालात बदले। भारत एक हजार साल लंबी इतिहास की अंधेरी और भयावह सुरंग में धकेल दिया गया। यह गुलामी की भयावह यातना से भरी सुरंग थी। राष्ट्र के रूप में भारत की चेतना को आघात पहुंचाने वाली, क्योंकि वे हमलावर भारत की आत्मा से परिचित थे, होना चाहते थे। भारत की कला, संस्कृति और स्मारक उनमें उन्नीसवीं सदी के नौजवान अंग्रेज अफसरों की तरह जिज्ञासाओं से नहीं भर रहे थे। वे सूखे रेगिस्तानों से आए दुर्दांत लुटेरे थे, िजनके सिर पर खून सवार था और वे किसी भी हद तक जा सकते थे। वे इस वहम में थे कि वे सब कुछ जानते हैं और उन्हें संसार का सर्वश्रेष्ठ ज्ञान मिल चुका है। इसलिए वेद या बुद्ध में उनकी दिलचस्पी का कोई सवाल ही नहीं था। वे बहुत आसानी से नालंदा को जलाकर राख करने का कलेजा रखते थे। वे ऐसे ही विजेता थे, जो आतंक और डर के सहारे बाकी दुनिया पर कत्लेआम और कब्जा करने निकले थे। इनकी चपेट में आकर जिन्होंने अपनी पहचानें बदलीं, वे और ज्यादा घातक होते गए। अपनी जड़ों से भटकी और दूर तक फैली एक नस्ल अपने ही राष्ट्रों के लिए आत्मघाती बनती चली गई।
इसलिए जब विवेकानंद जैसे किरदार भारत की घायल सदियों में दूर-दूर तक फैली राख और धुएं के पार देखते हैं तो भारत के असली परिचय तक पहुंचते हैं। उन्हंे भारत की आत्मा का असली अहसास होता है। तब एक दिन कन्याकुमारी में समुद्र के भीतर आखिरी चट्टान पर वे संसार को कुछ बताने को बेचैन हो उठते हैं। नियति जल्दी ही शिकागो की एक सभा में उन्हें वह मौका देती है। और एक सुबह दुनिया को पहली बार पता चलता है कि भारत के मायने क्या हैं?
इस्लाम के बिना यह चर्चा अधूरी और बेमानी होगी। मैं यहां टर्की के एक महापुरुष कमाल मुस्तफा पाशा का जिक्र करना चाहूंगा। कमाल ने जो किया, मेरी नजर में एक आहत राष्ट्र के खोए हुए गौरव को हासिल करने के लिए एक बड़ी नजीर है। टर्की एक इस्लामी मुल्क है। लेकिन पाशा की नजर में वह इस्लाम के पहले भी कुछ था। उनकी अपनी परंपराएं थीं। भाषा थी। संस्कृति थी। यह बात और है कि इस्लाम की सदियों की सोहबत में सब कुछ धुंधला गया था। जब इस्लाम के अंधड़ अपनी चपेट में आने वाले हर भूभाग और वहां के बाशिंदों की शक्लें और पहचान हमेशा के लिए बदल रहे थे तब टर्की भी अपनी जड़ों से टूटकर तबाह हुआ। बीसवीं सदी की पहली चौथाई में इस्लाम का आखिरी खलीफा यहीं से अपनी हुकूमत चला रहा था। कमाल मुस्तफा पाशा के तस्वीर में आते ही इस मुल्क ने सबसे पहले उठकर अपने ऊपर चढ़ी सदियों की धूल झटकारी और पहली ही अंगड़ाई में एक राष्ट्र के रूप में अपनी गुमशुदा याददाश्त पर जोर डाला।
पाशा ने फौरन कई कदम एक साथ उठाए। उन्होंने टर्की को अपनी मूल पहचान की तरफ मोड़ा। भाषा का शुद्धिकरण इस हद तक किया कि अरबी-फारसी के शब्दों को बीन-बीनकर हटाया गया। एक मजहब के रूप में उन्हांेने इस्लाम को कायम रखा मगर अपने राष्ट्र की शर्तों पर। मसलन, हम कुरान अरबी में नहीं, तुर्की में पढ़ेंगे। उन्होंने अल्लाह शब्द तक का तुर्की में तर्जुमा किया। कहा कि हम नई मस्जिदें नहीं बनाएंगे। एक सेकुलर निजाम में पुरानी मस्जिदें, ऐतिहासिक इमारतें होंगी, जहां सब -जा सकेंगे। जुमे की बजाए संडे को छुट्टी रखेंगे। सार्वजनिक स्थानों पर मजहबी लिबास पर बंदिश रहेगी। कुछ कट्टरपंथियों ने कुरान के अनुवाद की मुखालिफत की तो पाशा का जवाब था-वो कैसा अल्लाह है जो सिर्फ अरबी में समझेगा और वही बात तुर्की में नहीं। पाशा ने पंद्रह साल में एक राष्ट्र की कायापलट कर दी। कृतज्ञ राष्ट्रवादी नागरिकों ने आदर से उन्हें अपना अतातुर्क कहा। अतातुर्क मतलब राष्ट्रपिता!
अब आप इस अर्थ में आप भारत को देखने की हिम्मत जुटाइए। हमारे यहां क्या चला?
जब टर्की में पाशा अपने मुल्क की छाती पर लदे पड़े खलीफा को रफा-दफा कर रहे थे तब महात्मा गांधी यहां के मुसलमानों को खुश करने के लिए खिलाफत आंदोलन का प्लान कर रहे थे। भारतीय मुसलमानों की जिंदगी को बेहतर करने का इससे बेहतर विजन उनके पास नहीं था और इसी पर आजाद भारत की सेकुलर सरकारों ने आयतों की तरह अमल किया। खुश करने के लिए तात्कालिक और सस्ते उपाय, जिसने एक जिंदा कौम को वोट बैंक का अपमानजनक तमगा दिया। सरदार पटेल ने जब सोमनाथ के सीने से इतिहास का अपमानजनक दाग धोकर भारत के भाल पर सम्मान का त्रिपुंड लगाया तो यह कारनामा सबसे पहले पंडित नेहरू को ही रास नहीं आया। वे तो डॉ. राजेंद्र प्रसाद तक से खैर खाकर ही बैठ गए, जो सोमनाथ के समारोह में बतौर राष्ट्रपति शान से शरीक हुए। जाने-माने पत्रकार दुर्गादास ने अपनी किताब कर्जन टू नेहरू में उस विकट दौर की आंखों देखी लिखी है। किसी भी राष्ट्र के जीवन में ये छोटी, मामूली और भूलने योग्य घटनाएं नहीं हैं। खासकर तब जब वह राष्ट्र एक नई जिंदगी शुरू करने जा रहा हो। और इनका नतीजा क्या हुआ? तो सत्तर साल में वर्ग विशेष की हालत में कोई बदलाव आया और ही वे भारत की रूह से जुड़ पाए। उनमें पराएपन का असंतोष बना ही रहा, जो आए दिन के टकराव की जड़ बनकर जम गया। पाकिस्तान में पैदा हुए मशहूर लेखक तारेक फतह खुद को अपने पंजाबी पूर्वजों से जोड़कर हिंदुस्तानी कहने में गर्व महसूस करते हैं। इस्लामी हमलावरों से अपना इतिहासजोड़ने वाली मुस्लिम मानसिकता पर उन्हें सख्त ऐतराज है।
एक भावुक भारतीय के रूप में भारत के टुकड़े मुझे बेचैन करते हैं। अयोध्या में भगवान राम का एक टेंट में पनाह लेना मुझे अफसोस से भरता है। वाराणसी में प्राचीन विश्वनाथ मंदिर का नंदी अपने शिव की बाट जोह रहा है। उसे नहीं पता कि यहां वक्त ठहर गया है। तब मैं सोचता हूं कि यह कैसा राष्ट्र है, जिसके देव और महादेव ही अपनी जगह से बेदखल हैं। बचा-खुचा भारत अपनी सनातन सांस्कृतिक पहचान की बुनियाद पर एक नई शुरुआत कर सकता था। 1947 में बहुत आसान था कि हम कुछ पुराने दाग धो लेते। कुछ नए रास्तों पर निकलते। बटवारे के हिसाब-किताब में चीजें ज्यादा बेहतर ढंग से साफ हो सकती थीं। अलग से सेकुलर होने का झंडा सिर पर टांगने की इसलिए जरूरत नहीं थी क्योंकि भारत अपने स्वभाव और अपने चरित्र से सेकुलर ही है। वह अड़ियल होता तो किसकी हिम्मत थी कि सिंध के पार कभी कोई आंख तिरछी करके भी देखता। 17 बार हमले और दिल्ली पर कब्जे तो सपने में भी संभव नहीं होते।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी भी विचार को धर्म या संस्कृति की शक्ल लेने में चंद सदियों का वक्त नाकाफी है। इसमें हजारों साल और पीढ़ियां खपती हैं। विवादों और असहमतियों को पचाने की अथाह क्षमता हमेशा जरूरी है। भारत ने हजारों साल की अपनी यात्रा की शुरुआत में ही यह सीख लिया था कि पूरी दुनिया एक कुटुंब है। जीओ और जीने दो। सब सुखी हों। सब स्वस्थ हों। किसी के हिस्से में कोई कष्ट आए। महान पुरखों की यही विरासत भारत को दुनिया में सबसे अलग करती है। यह देश हमसे अपने सर्वश्रेष्ठ का हकदार है। यह जरूरी है कि हम इसे समझने का बोध पैदा करें। वह आंख हमारे पास हो, जो समय के पार भारत को देख और समझ सके। इसके लिए इतिहास बोध होना जरूरी है, जो हमेशा से हमारा सबसे कमजोर पहलू रहा है। हमें हमारा ही पता दूसरे बताते आए हैं!
संक्षेप में मैं कहूंगा, सांसारिक और आध्यात्मिक क्षेत्र की हर गहराई और ऊंचाई को छूते हुए भारत ने सांस्कृतिक-आर्थिक समृद्धि के कई चमकदार दौर देखे। फिर वह अपनी ही दुनिया में मस्त रहा। जैसे उसे कुछ और पाना शेष नहीं था। यह उसकी मस्ती का ही आलम है कि नालंदा के हत्यारे बख्तियार खिलजी के नाम पर नालंदा की लाश के पास बख्तियारपुर नाम का शहर आज भी आबाद है। इस मस्ती का क्या कहिए कि बहराइच में महमूद गजनवी के हमलावर भांजे सालार मसूद की कब्र कब मन्नत पूरी करने वाली एक दरगाह बन गई, किसी को कानो-कान खबर हुई।
ऐसे एक दरियादिल राष्ट्र के रूप में यह अजूबा भी सिर्फ भारत में ही मुमकिन है।