Thursday, 10 August 2017

सरदार सरोवर का सार संक्षेप




 मेधा पाटकर को आखिर क्या चाहिए? तीन दशकों से यह औरत सड़कों पर है। हरसूद में 1989 की रैली के समय पहली बार मेधा का नाम देश के स्तर पर सुना गया था। वे इंदिरा सागर बांध की डूब में आ रहे गांवों के मसले को लेकर हरसूद आई थीं। एक बड़ी रैली में देश भर के हजारों सामाजिक कार्यकर्ताओं समेत कई जानी-मानी हस्तियां यहां जुटी थीं। इनमें मेनका गांधी, बाबा आमटे, सुंदरलाल बहुगुणा और वीसी शुक्ला वगैरह भी थे। हरसूद को हर हाल में बचाने के संकल्प की याद में एक विजय स्तंभ वहां स्थापित किया गया था। वरिष्ठ पत्रकार एनके सिंह तब इंडिया टुडे में थे। दो पेज की उनकी स्टोरी का हेडलाइन था-हार न मानने वालों का हौसला!
  बाद में मेधा बेसहारा विस्थापितों की आवाज बन गईं। विकास की परियोजनाओं की चपेट में आकर बेदखल हो रहे लोगों ने उन्हें हर कहीं अपने बीच पाया। शहरों की गंदी बस्तियों में रहकर अपनी आजीविका कमा रही आबादी हो या गांव-पहाड़ों में खदानों और हाईवे के निर्माण से उखड़ने वाले गुमनाम लोग। मेधा ऐसी हर जगह पर पहुंची, जहां मानवीय विस्थापन सरकार के अमानवीय तौर-तरीकों का शिकार बना। तीस साल से नर्मदा बचाओ आंदोलन उनकी पहचान ही बन गया। नर्मदा घाटी में बन रहे बांधों की श्रृंखला ने थोक के भाव में गांव और आबादी बेदखल की। हरसूद जैसी बड़ी बस्ती समेत करीब ढाई सौ गांव इंदिरा सागर में समा गए। निसरपुर जैसे कस्बे के साथ करीब 190 गांव सरदार सरोवर की डूब में हैं। एक बांध मध्यप्रदेश में है। दूसरा गुजरात में। मगर पूरी डूब मध्यप्रदेश की है। ये हजारों करोड़ रुपए की लागत के पावर प्रोजेक्ट हैं, जिनसे पैदा होने वाली बिजली और जलाशयों का पानी बेतहाशा बढ़ती आबादी के लिए बेहद जरूरी है। इनमें सरकारों की पूरी ताकतें लगी हैं। पार्टियां कोई भी हों। 
 मैं 2004 से इस मसले से लगातार जुड़ा हूं। हमने हरसूद को बहुत करीब से देखा। अब बड़वानी भी देख लिया। इस बीच मध्यप्रदेश में व्यवस्था परिवर्तन का नारा बुलंद करके सत्ता में आई बीजेपी की सरकारें ही रहीं। केंद्र में ज्यादा समय यूपीए का झुंड था, जिसे 2014 में नरेंद्र मोदी ने उलट दिया। एक राज्य के दो सौ-ढाई सौ गांवों का दो बार में दस साल के भीतर डूबना किसे कहते हैं? शायद ही किसी राज्य के हिस्से में ऐसी मुसीबत आई हो। बांध सरकार की जरूरत हैं, उससे ज्यादा जिद हैं। मगर इससे जुड़ा मानवीय विस्थापन का सवाल उनके लिए उतना ही मायने नहीं रखता। जबकि सबसे अधिक मानवीय संवेदना की दरकार रखने की जहां जरूरत थी, वहां सरकार की भ्रष्ट मशीनरी ने दोनों मौकों पर क्या किया?
 यह काम बहुत बेहतर ढंग से बहुत आसानी से हो सकता था। 2004 में इंदिरा सागर बांध के कारण जो हालात सामने आए थे, बेशक उसके लिए बहुत हद तक दिग्विजयसिंह जिम्मेदार थे, जिन्होंने दस साल सत्ता में रहकर भी वहां कुछ खास नहीं किया और जब बांध अपनी पूरी ऊंचाई पर बनकर खड़ा हुआ तब होश फाख्ता हुए नई मुख्यमंत्री उमा भारती के। मगर वे ज्यादा समय सत्ता में नहीं रहीं। थोड़े समय बाबूलाल गौर मुख्यमंत्री रहे और फिर एकछत्र राज करने के लिए तकदीर ने शिवराजसिंह चौहान का दरवाजा खटखटाया। उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी पर 12 साल पूरे हुए। यह एक युग की अवधि है। 
 आज जो कुछ भी सरदार सरोवर बांध के डूब क्षेत्र में मचा है, उसके लिए बिल क्लिंटन, सद्दाम हुसैन या मुअम्मर गद्दाफी जिम्मेदार नहीं हो सकते। जब सरदार सरोवर के विस्थापितों को मुआवजे बट रहे थे, तब इंिदरा सागर के विस्थापन-पुनर्वास की नाकामी का स्वाद बखूबी चखा जा चुका था। पूरी सरकारी मशीनरी की क्षमता और कारनामे उजागर हो चुके थे। एक सबक सीखने के लिए 13 साल कम नहीं होते, बशर्ते मन में वाकई व्यवस्था परिवर्तन की गहरी चाह हो। चुनाव जीतना और बात है, मगर ऐसी कोई चाहत मध्यप्रदेश सरकार में कभी किसी मुद्दे पर दिखाई नहीं दी। वर्ना शिवराजसिंह चौहान चाहते तो सरदार सरोवर के विस्थापन और पुनर्वास को इसी 36 सौ करोड़ रुपए में दुनिया का सर्वश्रेष्ठ मॉडल बना सकते थे। उन्हें पूरा काम अपने हाथ में रखना ही था। लगातार उन 88 स्थानों की मॉनीटरिंग करनी थी, जहां उनके अफसरों ने पुनर्वास के नाम पर 15 सौ करोड़ रुपए फूंके। जिस 900 करोड़ के स्पेशल पैकेज का तोहफा देने के बावजूद इस समय विस्थापितों की गालियां मिल रही हैं, यह रकम भी वहीं के विकास पर लगा देनी थी।
 सत्ता में आकर अपनों को कमाने के हजार मौके हैं। सिर्फ एक काम ईमानदारी से देश-दुनिया, राजनीतिक नेतृत्व और सरकारों के लिए नजीर बन जाए, इस सोच के साथ शिवराज अपने किसी भरोसेमंद बिल्डकॉन को ही यह जिम्मा दे देते कि निसरपुर समेत बाकी 88 स्थानों पर शानदार सुविधाओं से लैस टाउनशिप पूरी प्लानिंग से बनाई जाएं। बेहतर सड़कों के नेटवर्क से जुड़ी रिहाइशें, उनके कारोबारी कॉम्पलैक्स, बिजली, पानी, स्कूल, अस्पताल और संचार के साधन प्रदेश में सबसे उम्दा देते। नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (एनवीडीए) का मुख्यालय आखिरी विस्थापित परिवार के अपने गांव में रहने तक धार और बड़वानी से ही काम करता, भोपाल में नहीं। ग्राउंड पर हर महीने एक रिव्यू सीएम की काफी होती। एक निजी एजेंसी अलग से हरेक हरकत की मॉनीटरिंग करती। एक टाइमलाइन तय होती। फर्जी रजिस्ट्री जैसे कारनामे करने वालों को हमेशा के लिए नौकरी से निकालती तो एक पैसा भी दलाली या रिश्वत में खाने के पहले बाकी लोग हजार बार सोचते।
 प्रदेश के मुखिया की ऐसी सक्रिय और विजनरी पहल उनका कद कई गुना बढ़ा देती। इस पूरे काम में नर्मदा बचाओ आंदोलन से मेधा पाटकर और उनकी टीम को भी जोड़ती। सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस खेहर ने मेधा से कहा कि आप बताइए आप विस्थापितों के लिए क्या चाहती हैं, हम उससे ज्यादा के आदेश देने को तैयार हैं। यही अमृत वचन शिवराजसिंह चौहान दस साल पहले बोल देते तो बांध पर 17 मीटर के गेट लगने के पहले यह झमेला खड़ा नहीं होता। गांव के लोग खुशी-खुशी अपने नए घरों में शिफ्ट हो गए होते। पहले से शानदार व्यवस्थित और सुविधा संपन्न घरों को कौन ठुकराता, जहां अगले ही दिन से उनके पास करने को काम-धंधे होते, बच्चों को पहले से अच्छे स्कूल, अस्पताल मिलते?  
 तब शिवराज सरकार प्रधानमंंत्री नरेंद्र मोदी को बुलाकर विकास का पर्व बड़वानी में मनाती। मैं दावे से कह रहा हूं कि यह संभव हो सकता था। अगर आंदोलन ही नर्मदा बचाओ का पैदाइशी मकसद है तो सरदार सरोवर के गांव ही मेधा और उनकी टीम को बाहर का रास्ता बता देते। कौन पहले से अच्छे घरों और पहले से अच्छे कारोबारी हालात में जाकर रहना नहीं चाहेगा। सिर्फ विजन चाहिए था। सख्ती चाहिए थी। अफसरशाही उसकी जगह पर होनी थी। ऐसा होता तो सरकार को बेशकीमती 13 साल गंवाने और 36 सौ करोड़ रुपए खर्च के बाद ऐसी लानतें न मिलतीं। यह हमारे राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व की आपराधिक भूल है, जिसका खामियाजा सरदार सराेवर के 193 गांवों के करीब 40 हजार परिवार इस वक्त भुगत रहे हैं!
 12 दिन के धरने के दौरान भी सरकार ने अपने कारिंदों पर ही भरोसा किया। मुख्यमंत्री एसपी-कलेक्टर को मेधा को मनाने के लिए भेजते रहे। फिर कोई भय्यूजी महाराज प्रकट हुए। मेरा मेधा को कोई समर्थन नहीं है। न किसी किस्म के विरोध में कोई रुचि है। मेधा और उनकी टीम पर यह तोहमतें लगती रही हैं कि वे विदेशों से आए पैसे के बूते पर हमारे विकास के प्रोजेक्ट के खिलाफ माहौल बनाती हैं। अगर ऐसा है तो भी क्या दिक्कत थी। अभी कश्मीर में विदेशी फंड की दम पर आतंक फैलाने वाले कई दगाबाज गिलानी-फिलानी अंदर हुए हैं। सरकार के पास अगर ऐसे कोई सबूत थे तो मेधा पाटकर की जगह चिखल्दा गांव के धरने पर नहीं, तिहाड़ में होनी चाहिए थी। सिरदर्द पैदा करने के लिए उन्हें क्यों खुला छोड़ा हुआ है?
  नर्मदा बचाओ आंदाेलन आज का नहीं है। तीस साल से ज्यादा हो गए घाटी में इस आवाज को गंूजते। बड़े बांधों के औचित्य की बहस बहुत बड़ी है लेकिन एनबीए की आवाज विस्थापन के तौर-तरीकों को लेकर ही गूंजती रही। उन्होंने काश्मीरी नौजवानों की तरह भारत के माथे पर पत्थर नहीं बरसाए, वे नक्सलियों की तरह भी पेश नहीं आए। वे अदालतों में गए। आरटीआई के जरिए असलियतें उजागर कीं। खंडवा, बड़वानी, भोपाल और दिल्ली में धरने-रैली करते रहे। नारे लगाते रहे। ज्ञापन सौंपते रहे। याचिकाएं बढ़ाते रहे। शिकायतें करते रहे।
 सिंहस्थ के समय तूफान आया तो मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान बांधवगढ़ नेशनल पार्क में अपने परिवार को छोड़कर रात में उज्जैन पहुंचे और परेशानहाल श्रद्धालुओं को अपने हाथों से चाय पिलाई। उनकी रहमदिली और सहजता के कायल कई हैं। भोपाल में ज्यादा बारिश ने जीना हराम किया तो सुबह सीएम पार्षदों से आगे निचली बस्तियों में दौड़ते दिखे। दस साल में जब भी फसलें चौपट हुईं शिवराज का हेलीकॉप्टर अनगिनत खेतों में उतरा। ऐसे हर स्पॉट से अखबारों में एक हेडलाइन रोचक जुमला ही बन गया, शिवराज ने कहा-मैं हूं न! गांवों के चौकीदारों से लेकर शहरों में काम करने वाली बाइयों तक शायद ही कोई तबका बचा होगा, जिसकी गुहार अपने सरकारी बंगले में पंचायत बुलाकर न सुनी हो। प्रमोशन में आरक्षण के लिए इतने प्रतिबद्ध दिखे कि सुप्रीम कोर्ट में महंगे वकील खड़े कर दिए।
 सरदार सरोवर बांध के 40 हजार विस्थापित परिवार किस हाल में हैं, वहां अफसर क्या कर रहे हैं, पुनर्वास स्थल रहने लायक हैं या नहीं, लोग वहां क्यों नहीं जा रहे, उनके कारोबार डूब तो नहीं रहे, वे कमाएंगे क्या, उनके मन में क्या है, सरकार सब कुछ अच्छा ही कर रही है तो वे नाराज क्यों हैं, हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट के चक्कर क्यों लगा रहे हैं, यह पूछने न वे गए और न ही उनका कोई काबिल मंत्री। वहां मेधा पाटकर गईं। 12 दिन धरने के बाद एक शाम बंदूकों-लाठियों से लैस तीन हजार पुलिस वालों ने उन्हें जबरन उठा लिया। दो दिन इंदौर के बांबे हास्पिटल में रखकर उन्हें धार जेल भेज दिया गया। डेढ़ महीने पहले किसान आंदोलन ने सरकार के 13 सालों के किए कराए पर पानी फेर दिया था। अब विस्थापितों की सुर्खियां रही-सही कसर पूरा कर रही हैं। मामला हाथ से निकल चुका है।
 2004 में हरसूद के हाल पर लिखी मेरी किताब 2005 में छपकर आई थी। इसके दस साल बाद एक फेलोशिप के तहत मुझे इंदिरा सागर बांध के इलाके में फिर जाने का मौका मिला। करीब एक साल तक मैंने हरसूद समेत खंडवा, हरदा और देवास जिले के कई पुनर्वास स्थल देखे और उन परिवारों में वापस गया, जो 2004 में बेदखल हुए थे। बहुत संतुलित भाषा का प्रयोग करते हुए मैं कहना चाहूंगा कि सरकार में आने के पहले हमारे ज्यादातर नेताओं को पता ही नहीं है कि उन्हें जनता के लिए करना क्या है? पार्टियों में उनकी ऐसी कोई ट्रेनिंग नहीं है कि ऐसे विकट हालातों में वे किस विजन और नीयत से पेश आएं। वे पार्टी में छोटे-मोटे पदों से होकर पंच-पार्षद बनते हुए विधायक और सांसदों के टिकट तक पहुंचते हैं। फिर तमाम तीन-तिकड़में और तकदीर उन्हें एक शपथ तक ले आती है।
 हमने देखा है कि नेताओं की इस राजनीतिक यात्रा में सफेद झूठ के साथ खरा पैसा पानी की तरह बहता है, जिसे जुटाने के लिए एक के बाद दूसरे और बड़े पद जरूरी होते हैं। जितना बड़ा पद, उतना बड़ा झपट्‌टा। सरकार में आने या पद के पाने का एकसूत्रीय कार्यक्रम बेहिसाब दौलत कमाना भर है। इसलिए सरकार में आते ही ये नेता पहले से सत्ता का मजा ले रहे उन घाघ अफसरों के चंगुल में जा फंसते हैं, जो एक बड़ी परीक्षा पास करके 30-35 सालों के लिए सिस्टम की छाती पर सवार होते हैं। ऐसी अफसरशाही के सहारे मूर्ख और लालची नेताओं को सत्ता का अवसर जन्नत जैसे अहसास में ले जाता है, जहां पीड़ित जनता की कराह भी वे अफसरों के मुंह से मधुर गीत के रूप में सुनते हैं। बड़ा पद उनके लिए दूल्हे के रूप में घोड़ी की सवारी जैसा है, जिस पर वे अगले पांच साल तक सवार रहेंगे। भाषण देंगे। घोषणाएं करेंगे। शिलान्यास, उदघाटनों की शोभा बढ़ाएंगे। किसी ठोस नतीजे या बदलाव की उम्मीद बेकार है, क्योंकि ज्यादातर के पास वैसा विजन ही नहीं है। नीयत भी नहीं है।
 मेरे मध्यप्रदेश में यही व्यापमं की सीख है, यही शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन के खस्ताहाल इन्फ्रास्ट्रक्चर की इबारत है, यही बेमौत मर रहे किसानों से मिला सबक है और यही अब सरदार सरोवर का सार संक्षेप है!


















Tuesday, 8 August 2017

मेधा पाटकर का धरना, अमित शाह का आगमन और लोकप्रिय मामा!

ये लेखक के अपने विचार हैं- 
सियासत में अपनी कतई दिलचस्पी नहीं है। सुना ही है कि अमित शाह थोड़े दिन बाद भोपाल आ रहे हैं। वे तीन दिन राजधानी की शोभा बढ़ाएंगे। वे कई राज्यों में पार्टी और सरकारों की हालत पर बात करने के बाद अब मध्यप्रदेश का रुख कर रहे हैं। वे पार्टी कार्यालय में ही रहेंगे। किसी ने बताया कि एक राज्य के मुख्यमंत्री को उनके अफसरों ने तीन दिन प्रजेंटेशन देना सिखाया ताकि वे अपनी सरकार के प्रदर्शन को शाह के सामने स्क्रीन पर आंकड़ों, ग्राफ और चार्ट के माध्यम से समझा सकें। उनके अफसरों ने अपने बॉस के बेहतर प्रदर्शन के लिए खासी मशक्कत की।
 अमित शाह जब भोपाल आएंगे तो शायद उन्हें याद आए कि यहां पिछले दिनों किसान आंदोलन का जानलेवा शोर कितना कर्कश था। लाखों टन प्याज प्रबंधन का अफसरों के लिए मुनाफेदार मॉडल भी दूसरों को बताने की एक मिसाल हो सकता है। इनके अलावा कुछ ताजा हेडलाइन भी होंगी। जैसे-पुलिस ने मेधा पाटकर को अनशन से उठाया। उनके आने में दस दिन बीच में हैं। तब तक सरदार सरोवर के गांवों में क्या होगा, आज कहना कठिन है। इस सिचुएशन में मैं कहना चाहूंगा कि मध्यप्रदेश के अफसरों ने यहां के बच्चों के लोकप्रिय मामा के अच्छे प्रदर्शन के लिए कुछ अलग तरीके की तैयारी की हुई है। अपने काबिल अफसरों के प्रति शिवराज के भरोसे की दाद देनी होगी।
 मेधा पाटकर को अरेस्ट करने की खबर जब मिली, तब मैं पिछले 13 साल बाद हुए मध्यप्रदेश के दूसरे बड़े विस्थापन के इलाके से लौटा ही हूं। करीब एक हफ्ता वहां बिताया। मुझे 2004 का हरसूद याद आ गया। जैसा हरसूद, वैसा निसरपुर। हरसूद इंदिरा सागर डैम की डूब में सबसे आखिर में आया इकलौता शहर था। निसरपुर सरदार सरोवर बांध की डूब में व एक आखिर कोने में सबसे बड़ा कस्बा है। टीवी चैनल के समय साल भर तक हम हरसूद को लगातार कवर किए थे। एक किताब भी आई थी। तब भी सरकार बीजेपी की ही थी। नई सरकार की मुख्यमंत्री उमा भारती थीं। उनकी दम से बनी सरकार को एक साल भी नहीं हुआ था कि इंदिरा सागर बांध की लहरें हरसूद से टकराने लगीं। उमाजी के चेहरे से जीत की खुशी के रंग फीके भी नहीं पड़े थे कि सामने लंबा-चौड़ा बांध था। हरसूद खत्म हो गया। उसके खत्म होते-होते तिरंगे में तूफान आया। उमा भारती बह गईं। सत्ता से भी, संगठन से भी। अब निसरपुर में खड़े होकर देखें तो उस पार गुजरात में सरदार सामने है-सरदार सरोवर। 17 मीटर के गेट उस जल सिंह के माथे का चमचमाता ताज हैं। यहां तक पानी आने का मतलब निसरपुर तक डूब।


 नर्मदा बचाओ आंदोलन का कहना है कि 40 हजार प्रभावित परिवार हैं। सरकार कहती है कि भूल जाओ, आप 38 हजार थे। फिर नए सर्वे में 23 हजार ही रह गए थे। अब हमारे पास सिर्फ 7 हजार ऐसे हैं, जिनका पुनर्वास करना है। ये आंकड़ों का चक्कर दिलचस्प है। 1992 में पहली बार सर्वे हुआ कि सरदार सरोवर में कितने गांव और लोग डूबेंगे? तब न सरदार सरोवर बांध था और न इसका पेट भरने वाला इंदिरा सागर बांध था। जब दोनांे बन चुके तब 2008 में एक नया सर्वे नर्मदा कंट्रोल अथॉरिटी ने कराया। पहले सर्वे में 193 गांवों के 38 हजार परिवार डूब में थे। दूसरे में 23 हजार बचे तो बाकी 15 हजार को नमस्कार करते हुए शुभ सूचना दी गई-श्रीमान आप यहीं रहिए। आप नहीं डूब रहे। मुबारक हो।
 गांव वालों के लिए नहीं डूबने की यह खबर गुड न्यूज क्यों नहीं थी, यह जानने के लिए निसरपुर में ही आइए। 28 परिवार हैं। पहले पूरे डूब में थे। फिर 365 परिवारों को डूब में नहीं माना गया। अब ये डूब से बाहर हुए लोग कह रहे हैं कि अब चारों तरफ से पानी से घिरकर कैसे काम चलाएंगे। अफसरों ने खुश होकर बताया कि नाव से आ-जा सकते हैं। रोचक बात यह कि बचे हुए 15 हजार लोग भी मुआवजा पा चुके हैं। कोई बात नहीं पैसा तो हाथ का मैल है। जनता का ही है। यह रकम अपने पास रखिए। बस शुक्र मनाइए कि आप डूबने से बच गए! अब इनकी लड़ाई यह है कि हमें डूब में मानिए।
  मुआवजे से ज्यादा अहम पुनर्वास का मामला है। मुआवजा तो उसका एक मामूली हिस्सा है। तो डेढ़ दशक पहले मिला मुआवजा यहां-वहां खर्च हो गया। कुछ लोगों ने ही दूसरे कारोबार में लगाया। कम लोग ही उन 2500 प्लाटों पर रहने गए, जो उन्हें पुनर्वास के लिए सरकार ने दिए थे। कपास के लिए मिट्‌टी की मोटी परत वाले खेतों को अधिगृहीत कर मकान बनाने के लिए टुकड़े दे दिए। खेतों से तीन फुट ऊंची संपर्क सड़कें निकाल दीं, जो अब जर्जर हो चुकी हैं। कई जगह खाली खंभे थे, जहां से बिजली आनी थी। न लोग आए, न ये पुनर्वास जैसे स्थल बन सके। ऐसे 88 ठिकानों को बनाने में सरकारी कारिंदों ने 15 सौ करोड़ रुपए खर्च किए। इन जगहों को दूर से देखकर भी अंदाजा लगा सकते हैं कि पैसे की किस तरह बंदरबांट हुई होगी। मुआवजा समेत सारे भुगतान 36 सौ करोड़ के हैं। गुजरात को पानी और मध्यप्रदेश को बिजली का बड़ा हिस्सा देने को तैयार सरदार सरोवर बांध को सरहद मानें तो सरहद के दोनों तरफ बीजेपी का डंका बज रहा है।

 यहां की बीजेपी के राज में निसरपुर हरसूद पार्ट-2 ही है। अमित शाह की आमद के पहले बड़ा सवाल यह है कि सरकार ने 13 साल में क्या सबक सीखा? दूसरा बड़ा विस्थापन हरसूद से ढाई सौ किलोमीटर के फासले पर इसी नर्मदा के एक छोर पर होने वाला था। तो अफसरों ने क्या सबक लिया था? वे एक बार फिर बुरी तरह नाकाम हुए हैं और यह झमेला सरकार की झोली में डालकर मौज में हैं। हरसूद में 2004 जून में मेधा सिर्फ दौरे पर ही आईं थी। धरना नहीं दिया था। आलोक अग्रवाल जो मोर्चा संभाले थे। इस विस्थापन में जनसंघर्ष के इस आईआईटी पास जिद्दी सिपाही का किरदार भी बदला हुआ है। वे अब आम आदमी पार्टी के नेता हैं। इस बीच वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि जमीन पर अंतहीन संघर्ष करके कुछ हासिल नहीं होने वाला। सीधे राजनीति में आकर ही कुछ बदलाव किए जा सकते हैं। अब वे दिल्ली के चक्रव्यूह में फंसे अति उत्साही केजरीवाल की सेना के एक जमीनी सूबेदार हैं। विस्थापितों के पुराने जोड़ीदार आलोक सरदार सरोवर के प्रभावित इलाके में दौरा करने गए। धरने पर मेधा थीं यहां।
 2017 के मध्यप्रदेश के मीडिया में इस विस्थापन का शोर 2004 के हरसूद जैसा नहीं है। हालांकि चैनल और अखबार पहले से ज्यादा हैं। सहारा प्रणाम कहते हुए बताना चाहूंगा कि तब मैंने सहारा समय के लिए हरसूद कवर किया था। तीन कैमरा यूनिटों में दिल्ली से भुवनेश सेंगर और खंडवा से प्रमोद सिन्हा के साथ मैं भी था। वह देश का एक चर्चित कवरेज था। टीवी के लाइव प्रसारणों से हरसूद एक डिसास्टर टूरिज्म डेस्टीनेशन बन गया था। तीन मंत्री और छह पीएस उमा भारती ने वहां तैनात कर दिए थे। ताबड़तोड़ इंतजामों ने कुछ मामूली सी राहत हरसूद को डूबने के पहले दे दी थी।

 शिवराज ने तीन हजार पुलिस वालों के साथ कलेक्टर-एसपी को भेजकर मामला निपटाने कोशिश की। वे काफी टेक्नोफ्रेंडली हैं सो ट्वीट पर मेधा के प्रति सहानुभूति जाहिर करते रहे। मेधा ने उनके दोनों कारिंदों को यह कहकर विदा किया कि ट्वीट से संवाद ऐसे गंभीर मसले पर समझ के परे है। सामने आकर बातचीत कीजिए। उसके लिए धरना खत्म करने की क्या जरूरत है। बातचीत हाे सकती है। एक हाई पावर कमेटी बना दीजिए। शर्तें तय कीजिए। मेधा का राष्ट्र के नाम संदेश भोपाल आया। इधर श्यामला हिल्स की भृकुटि पर बल पड़े और उधर कलेक्टर-एसपी को ताव आ गया। गांव वालों से एक जोरदार मुठभेड़ के बाद ही वे मेधा को उठा सके। रात के सवा दस बजे वाट्सएप से मुझे पता चलाब कि मेधा को इंदौर के बांबे हास्पिटल ले जाया जा रहा है। कुल 12 लोग मंच से उठाए थे। कुछ बड़वानी और धार भेज दिए। एक का पता नहीं। पुलिस वाले छह को पहले ही गांव में टपकाते हुए निकले थे, जिन्हें बाद में उठा लिया गया।
 मेधा के जाते ही चिखल्दा की बिजली गुम है। इंटरनेट भी काम नहीं कर रहा। हरसूद अपने सामने बीती हर घड़ी के साथ बिखरता गया था। मगर जब हम वहां गए थे तब वहां जिंदगी रोज जैसी आम चहल-पहल से भरी थी। सिर्फ तीन हफ्तों के भीतर यह शहर उजड़ना शुरू हो गया था। 2004 का वह भारी अफरातफरी और परेशानी से भरपूर मानसून था। हरसूद समय की एक कड़वी याद बनकर मेरी किताब में सिमट गया। मैं अब रिपोर्टिंग से मुक्त हूं। भारत की यात्राओं की पूर्णाहुति किए ढाई साल गुजर गए। मगर नियति मुझे एक बार फिर इंसानी बेदखली के दूसरे ठिकाने पर लेकर गई। मैं दो दिन पहले निसरपुर में हरसूद जैसी ही रौनक देखकर आया हूं। वैसा ही हरा-भरा बाजार। दिन में भूख लगी, होटल-ढाबे हैं नहीं सो एक पाटीदार के यहां भोजन किया। उनकी पंद्रह साल की मुश्किलें हर निवाले के साथ सुनीं। कुछ कह नहीं सकते, शायद उन पाटीदार के पुश्तैनी घर के टूटकर डूबने के पहले हम उनके आखिरी मेहमान साबित न हों!
 मैंने वहां खापरखेड़ा के टीलों में ताकझांक की, जहां दो-ढाई हजार साल पुराने एक सलीके से बसे शहर के अवशेष अभी पूरी तरह सामने आ ही नहीं पाए थे। यह जगह नर्मदा के उथले प्रवाह वाली जगह पर सोच-समझकर बसाई गई थी। यहां से हर मौसम में नदी के दोनों किनारों से कारोबार मुमकिन था। उत्तर से दक्षिण के एक रास्ते में यह एक प्रमुख कारोबारी शहर था। खुदाई में ऐसे सबूत मिले, जिससे पता चला कि यहां का सीवेज सीधा नदी में नहीं जाता था। उन्होंने शहर के चारों कोनों पर बड़े-बड़े कुएं खुदवाए थे। सारा सीवेज इनमें फिल्टर होकर ही नदी की तरफ जाता था। जानकारों का कहना है कि इस काम को करने के लिए वहां के राजाओं ने तब कोई नदी की यात्रा वगैरह निकाले बगैर यह सब कर दिखाया था। यहां मिट्‌टी के बर्तनों, खिलौनाें और सजावट के सामानों का बड़ा कारोबार था। ऐसा अनुमान है कि मिट्‌टी का बड़ा उद्योग यहां था और ये सामान यहां से बनकर सब तरफ जाते थे। खापर यहां पकी हुई मिट्‌टी को कहते हैं। अतीत में एक बार न जाने क्यों उजड़कर टीलों में दफन होने के बाद बचा-खुचा यह पुराना गांव खापरखेड़ा एक बार फिर आखिरी सांसें ले रहा है।

 12 सौ आबादी के जिस चिखल्दा गांव में मेधा धरने पर रहीं, वह रियासत के दौर में चार रियासतों की सीमा चौकी था। होलकर, सिंधिया, पवार और स्थानीय बड़वानी रियासत। तहसील के खंडहर सबसे पहले पानी में आएंगे। बगल में रंगापुता नीलकंठेश्वर महादेव का मंदिर परिसर भी जलसमाधि लेगा। गांव-गांव में गुस्सा है। 2007 तक बांध बनकर तैयार था। यूपीए सरकार के समय बांध पर गेट लगने का मसला ठंडे बस्ते में रहा। उन्हें क्या पड़ी थी कि मोदी के गुजरात की प्यास बुझाएं और शिवराज के मध्यप्रदेश को रोशन करें। 2014 में मोदी ने गांधीनगर से आकर दिल्ली में अपना सामान खोलने के पहले नर्मदा कंट्रोल अथॉरिटी को कंट्रोल में किया। बांध पर धूमधाम से गेट लगे। जब लग चुके तो मोदी के गुजरात से अलार्म बज गया। यह वहां के चुनावों का बिगुल था। इधर, चमचमाती नर्मदा सेवा यात्रा का पुण्य लाभ देने के लिए तैयार नर्मदा मैया की पुकार बड़वानी में सुनवाई दी। यात्रा और विस्थापन के बीच मंदसौर में किसानों की अर्थिंयां उठ चुकी हैं। यात्रा का फल देने के लिए नर्मदा शिवराज सरकार को बड़वानी बुलाएंगी, यह यात्रा के कल्पनाकारों ने सपने में भी सोचा होता तो वे अपने विजनरी बॉस को नर्मदा के आसपास कभी न फटकने को कहते।
 कई राज्यों में बीजेपी और उनकी सरकारों की खैरखबर लेते हुए आगे बढ़ रहे हैं अमित शाह। बिहार में बेहिसाब सियासी ताकत का पर्याय रहे लालू यादव को जिंदगी का सबसे यादगार झटका देते हुए पधार रहे हैं वे। साथ में गुजरात से राज्यसभा की तरफ ताक रहे अहमद पटेल का केस भी उनकी अदालत में पूरे दमखम से चला। बेंगलुरू में गुजरात के बंधक विधायकों को पनाह देने वाले ताकतवर मंत्री के यहां छापों की सुर्खियां बता रही हैं कि शाहों से पंगा लेना कमजाेरों का काम नहीं। किस्से यहां तक चले सोशल मीडिया पर कि इस्लामाबाद में अदालत से लतियाए जाने के बाद नवाज शरीफ के अलविदा कहते ही शाह अपने सिपहसालारों को लेकर पाकिस्तान का रुख कर चुके हैं ताकि सरहद पार बीजेपी की सरकार की संभावनाएं तलाश सकें। ऐसे जोक आसानी से पैदा नहीं होते। यह शाह की जबर्दस्त ताकत का ही अहसास कराते हैं। जोक मध्यप्रदेश में भी खूब चले। सीएम शिवराजसिंह चौहान ने एक मीटिंग में कुपित होकर कलेक्टरों को फटकारा कि काम नहीं करोगे तो उल्टा टांग दूंगा। जोक आया कि भोपाल में कमलापार्क के पुराने पेड़ से लटके एक चमगादड़ ने दूसरे से कहा अब कलेक्टर जैसा फील कर रहा हूं!


















Tuesday, 9 May 2017

बाहुबली के बहाने

बाहुबली देखी। मुझे लगता है यह यश चोपड़ाओं, करन जौहरों, सूरज बड़जात्याओं, महेश भट्‌टों अौर सुभाष घइयों की हिम्मत और हैसियत के बाहर का फिल्मांकन है। बेमतलब लव स्टोरी, बकवास फैमिली ड्रामे और बेहूदी कहानियों पर कूड़ा मनोरंजन परोसने वाले हिंदी सिनेमा के समकालीन बड़े नाम वाले सस्ते फिल्म मेकर्स की समूची क्षमता के बाहर की बात थी-बाहुबली। महान कल्पनाशीलता से भव्यता के चरम को बड़े परदे पर रचने वाली यह कृति दक्षिण भारतीयों के बूते की ही बात थी। जिन्होंने कर्नाटक में महान विजयनगर साम्राज्य के खंडहर देखे हैं, उन्हें बाहुबली का कोई भी विराट दृश्य चौंकाएगा नहीं। 
 
बेल्लारी के पास हम्पी में पांच सौ साल पहले का यह साम्राज्य अंतिम हिंदू साम्राज्य के रूप में याद किया जाता है, जिसने भारत की भव्यता के सबसे ताजा और जानदार नमूने रचे। सिर्फ सवा दो साल यह शहर जीया और तालिकोट की प्रसिद्ध लड़ाई में पांच बहमनी सुलतान बहेलियों ने मिलकर इसे मिट्‌टी में मिला दिया। पुर्तगाली और अंग्रेज रिसर्चरों-लेखकों ने इसके हैरतअंगेज विवरण लिखे हैं। दक्षिण के वैभव को आंध्रप्रदेश में तिरुपति, तमिलनाडु मंे तंजौर, कर्नाटक में मैसूर, केरल में पद्मनाभ स्वामी टेंपल और तेलंगाना में निजाम के किस्सों में देखा-सुना जा सकता है।
दक्षिण में विकसित और बचे रह गए आर्ट, कल्चर, आर्किटेक्ट, म्युजिक, डांस की मालामाल परंपरा के सबूतों की कोई तुलना उत्तर भारत से नहीं हो सकती। उत्तर भारत में दसवीं सदी के बाद इतिहास पर छाया गहरा अंधेरा है और उसमें से निकले अवशेषों पर हम आज के धुंधले से भारत को देखते हैं। दक्षिण भारत ही वह जगह है, जहां भारत की पौराणिक सुगंध अब तक हवाओं में है। प्राचीन भारत की महानता के जिंदा सबूत दक्षिण के चप्पे-चप्पे में हैं। देश के नक्शे पर उत्तर और मध्य में भारत गौड़, नालंदा, विक्रमशिला, अयोध्या, मथ्ुरा, वाराणसी, दिल्ली, अजमेर, विदिशा, धार, मांडू, देवगिरि तक के खंडहरों में अपनी क्षत-विक्षत स्मृतियों में आहत और धूलधूसरित है। इतिहास की यात्रा में ये पड़ाव भारत को सदियों तक धुएं और राख में धकेलने वाले रहे हैं। अल्लाह का शुक्र है कि दक्षिण में काफी कुछ साबुत बचा रह गया।

सोने के प्रति दक्षिण के लोगों में गजब का लगाव है। विवाह में गरीब घर में भी दस-बीस तौला सोना चढ़ता ही है। हर पांचवा होर्डिंग वहां किसी आभूषण वाले का ही दिखाई देगा। आभूषणों का कारोबार हमारे परंपरागत सराफे के कारोबारियों जैसे नहीं, बल्कि बड़े मॉल जैसे हैं,जिसकी एक फ्लोर पर सिर्फ चांदी, दूसरी पर सोना और ऊपर हीरे-जवाहरात के जेवर जाकर पसंद कीजिए। बड़े ब्रांड, जो दक्षिण के हर शहर में हैं। अब आप बाहुबली के किरदारों के सिर्फ आभूषण ही गौर से देखिए। शायद उत्तर वालों के लिए यह सामान्य ज्ञान हो कि शरीर की शोभा के लिए स्वर्ण के किस-किस आकार-प्रकार के आभूषणों की कल्पना हमारे सौंदर्य शास्त्रियों ने कभी की होगी।
विजयनगर के खंडहर हो चुके मंदिरों में पांच सौ साल पहले के समृद्ध भारतीय जनजीवन की ऐसी ही अनगिनत तस्वीरें पत्थरों पर खुदी हैं। महान कृष्णदेव राय के समय का विजयनगर बाहुबली की माहिष्मती से कहीं कम नहीं था। तुंगभद्रा नदी के किनारे फैले उसके खंडहर आज भी अपने शानदार वैभव की गवाही दुनिया को देते हैं। सब कुछ हैरतअंगेज सा है। परदे पर लगता है कि कृष्णदेव राय के विजयनगर में फिल्मांकन हो रहा हो।

एक हजार साल पहले तंजौर में राजा राजा ने बिग टेम्पल के रूप में वही आश्चर्य रचा था, जो राजामौलि ने सिनेमा के परदे पर रचा। आर्किटेक्ट का ऐसा नायाब नमूना, जिसे देखने दुनिया भर के इतिहासप्रेमी यहां आकर दांतों तले उंगलियां दबा लेते हैं। 2010 में करुणानिधि ने उसका एक हजार सालवां जलसा मनाया था। बाहुबली में राजमाता द्वारा भेजे गए विवाह प्रस्ताव के साथ स्वर्ण उपहारों की झलक ने याद दिलाया कि कृष्णदेव राय विजयनगर से सात बार तिरुपति आए थे और स्वर्णदान के प्रसंग इतिहास में अंकित हो गए। भगवान वेंकटेश के शिखर पर मढ़ा सोना राजा कृष्णदेव राय के दान में मिले सोने को गला कर ही मिला था। दक्षिण भारतीय भाषाओं में राजा कृष्णदेव राय पर अनगिनत फिल्में बनी हैं।
तमिलनाडु में सिने सितारों की हैसियत हम जानते हैं। रजनीकांत की लोकप्रियता अमिताभ से हजारों गुना ज्यादा है। उत्तर भारत में जब दीपावली के दिन लोग घरों में लक्ष्मी पूजा की सजावट को अंतिम रूप देने में व्यस्त होते हैं तब तमिलनाडु में लोग नए कपड़े पहनकर अपने दोस्त-परिजनों के साथ उस दिन रिलीज हुई फिल्में देखते हैं। घरों से ज्यादा रौनक उस दिन सिनेमाघरों की होती है, जब महंगे बजट की मेगा फिल्में दीपावली पर परदे पर आती हैं। करुणानिधि, एमजी रामचंद्रन, जयललिता, विजयकांत, एनटी रामाराव जैसी सिनेमा जगत की हस्तियाें को वहां के अवाम ने राजनीति में भी महानायक बनने का मौका दिया। हमारे यहां भी अमिताभ, विनोद खन्ना, शत्रुध्न सिन्हा, हेमा मालिनी, जया प्रदा, जया बच्चन जैसे किरदार सियासत में आए। कौन कहां है देख लीजिए।
हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि राम या कृष्ण के समय भारत कैसा रहा होगा? बाहुबली की कहानी काल्पनिक हो सकती है किंतु चकाचौंध कर देने वाली पृष्ठभूमि और दृश्यों में उसे रचा गया है, उसने भारत के सनातन स्वरूप की एक झलक ही दिखाई है। इस लिहाज से कुछ भी काल्पनिक नहीं है। अगर बाहुबली नहीं देखी है तो नहाना-धोना बाद में पहले देख आइए। इसके बाद कभी दक्षिण भारत की यात्रा का लंबा प्लान बनाइए।
दक्षिण में दीवानगी सिर चढ़कर बोलती है।


Friday, 7 April 2017

मोरारी बापू और राम का तलगाजरडा

चैत्र नवरात्र के नौ दिन दिन तक पूरे समय मोरारी बापू की राम कथा सुनी। कल कथा की पूर्णाहुति थी। मेरी मां उन्हें नियमित सुनती थीं। कथा कहीं भी हो टीवी चैनल पर वे पूरे भक्तिभाव से सुना करती थीं। 2013 मंे वे इंदौर आए थे। तब मां को उन्हें सुनते हुए मैंने कुछ टुकड़े मोबाइल में रिकाॅर्ड किए थे। उनके साथ टुकड़ों-टुकड़ों में कथा के कुछ हिस्से मैंने भी अक्सर सुने। इस बार भोपाल में उनके आने का निमित्त बना और संयोग से मुझे भी मुक्त मन से सुबह नौ से दोपहर डेढ़ बजे तक सीधे सुनने का अवसर मिल गया। एक अच्छे अनुभव से गुजरा।
बापू हर बार अपनी कथा के लिए मानस का कोई एक प्रसंग या पात्र ले लेते हैं और फिर पूरे नौ दिन की कथा भारत की महान पौराणिक गाथाओं से गुजरती हुई उसी पात्र या प्रसंग के आसपास घूमती है। भोपाल में उन्होंने मानस विष्णु को अपना विषय के रूप में चुना। रामचरित मानस में विष्णु पर जो कुछ तुलसीदास ने कहा है, उसका वर्णन। भगवान राम विष्णु के अवतार थे या राम से विष्णु का अवतरण है? बापू कहते हैं कि राम ही परम तत्व हैं। उनसे कई विष्णु अवतरित हैं। 
 लगभग चार घंटे की बैठक मंे मोरारी बापू का उदबोधन आपसी संवाद की शैली में बमुश्किल देा से ढाई घंटा होता है। बाकी समय में मानस की चौपाइयों का कीर्तन, राम भजन। ढाई घंटे में भी कभी तीस-चालीस मिनट श्रोताओं की चिटि्ठयों पर चर्चा, पंद्रह-बीस मिनट कोई गीत, शायरी। बीच-बीच में राम का आवागमन हैं। कभी शिव और पार्वती के कथा प्रसंग, कभी विष्णु के वैभव की चर्चा और कभी महाभारत के रोचक किस्सों में कृष्ण पर बात।  
शुरू के दो दिन एक शब्द मैंने बार-बार सुना लेकिन समझा नहीं कि इसका अर्थ क्या है? वह शब्द था-तलगाजरडा। किसी भी बात पर बापू कहते-अपनी तलगाजरडा समझ मंे तो यह ऐसा है। तलगाजरडा परंपरा में यह ऐसा नहीं है। मैं समझा कि वे किसी गुजराती विषय से जोड़ रहे हैं। तीसरे दिन मैंने उनकी वेबसाइट देखी। पता चला कि तलगाजरडा उनका पैतृक गांव है। गुजरात के भावनगर जिले में महुआ तहसील का एक गांव, जहां शिवरात्रि के दिन 1947 में मोरारी बापू का जन्म हुआ। अपने गांव का नाम उन्होंने हर दिन किसी न किसी संदर्भ में लिया ही। जैसे तलगाजरडा के राम मंदिर मंे जो शिवलिंग है, एक दिन बापू ने उसका नामकरण किया-जीवनेश्वर महादेव। आज से तलगाजरडा के राम मंदिर के शिव का नाम जीवनेश्वर महादेव।

बीच कथा में बापू भावुक होकर कहते-मैं तुलसी का गुलाम हूं। अपनी जुबान को बेच दिया साहब! तुलसी और राम के प्रसंगों में कई बार उनकी आंखें छलछलाती। रामकथा का यह कर्णप्रिय गायक आत्मा की गहराई से बोलता महसूस होता। उनके कीर्तन पर झूमने के लिए श्रोता तैयार ही बैठे रहते। वे किसी विद्वान के वक्तव्य को अपनी कथा में लेते तो बड़ी ईमानदारी से स्वीकार करते कि यह जे. कृष्णमूर्ति का कहा हुआ है अौर यह ओशो ने कहा। ओशो का जिक्र तो हर दिन ही हुआ। वे कहते कि भागवत और रामकथा के वक्ताओं को यह सच सामने रखना चाहिए कि वे जिस किसी विद्वान की बात अपने प्रवचन में ले रहे हैं, उसके नाम का उल्लेख भी किया जाए। बापू कहते-यह ऋण है उन महापुरुषों का।
आत्मा के रस से सराबोर उनकी वाणी मधुर है। भारतीय जनमानस में राम की प्रतिष्ठा भी अदभुत है। तुलसीदास ने रामचरित मानस के जरिए राम की कथा को श्लोक से लोक में उतार दिया। संवत् 1631 में रामनवमी के ही दिन तुलसी ने अयोध्या में रामचरित मानस की रचना की। बापू ने बताया कि उस दिन लगन भी वही था, जो राम के जन्म के दिन चैत्र नवरात्र शुक्ल पक्ष की नवमी को था। किसी ईश्वरीय योग से ही तुलसी एक ऐसे समय प्रकट हुए, जब भारत दमन के अंधेरे में गुम था। वह अकबर की हुकूमत का समय था, जब माना जाता है कि मुस्लिम शासन के भयावह दौर मेंेे भारतीयों को कुछ समय की राहत नसीब हुई थी।
 बापू ने एक दिन अयोध्या में कथा की इच्छा प्रकट की। वे मानस गणिका पर कथा करना चाहते हैं। रामचरित मानस में गणिका के प्रसंग और पात्र पर। एक गणिका का किस्सा भी उन्होंने सुनाया-वासंती नाम की एक गणिका अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में अवध में जाकर बसी। उसे तुलसी की कामना है। परम बैरागी तुलसी अवध की गलियों से गुजरते हैं। वह तुलसी की माला जप रही है। किसी ने गोस्वामी से कहा-वह आपका नाम रट रही है। पहले दुनिया को रिझाया। अब रघुनाथ को रिझाने आई है। मानस का तुलसी उससे मिलने जाता है। गणिका का दर्शन देने। वह उठने की कोशिश करती है। गोस्वामी निकट आए। वासंती के हाथ कांप रहे हैं। तुलसी के चरण स्पर्श करते हैं। वह बोलने की कोशिश करती है। बाबा के चरण उसके निकट आए। बाबा ने चरणों का दान वासंती को किया। दोनों हाथ उसके चरणों पर हैं। गोस्वामी उसके सिर पर हाथ रखते हैं-कुछ कहना है वासंती? वह बोली-एक बार आपके मुख से राम का गुणगान सुनना चाहती हूं। तुलसी गाते हैं-श्रीरामचंद्र कृपालु भजमन...। यह पद पूरा होता है और उधर वासंती अस्तित्व में लीन हो जाती है। तुलसी का वासंती के पास जाने का संदेश है कि समाज को वहां जाना चाहिए, जहां कोई नहीं जाता। मैं अयोध्या में मानस गणिका पर कथा कहना चाहता हूं।
हर दिन उनके पास श्रोताओं के प्रश्नों की संख्या बढ़ती रही। मेरा एक सवाल था-अयोध्या में राम अपने जन्मस्थान से विस्थापित हैं। यह एक उलझन बनी हुई है। आप कई शायरों के साथ मिलते-बैठते हैं। कभी इस मसले पर कोई चर्चा हुई? बापू ने कोई उत्तर नहीं दिया। हर दिन तलगाजरडा का उल्लेख सुनने के बाद मैंने उन्हें फिर से लिखा-बापू, आप हर िदन तलगाजरडा का जिक्र करते हैं। आपकी महानता है कि आप इतनी विनम्रता से स्वयं को तुलसी का गुलाम कहने का साहस करते हैं। मगर तुलसी के भी मालिक हैं राम और अयोध्या उनकी तलगाजरडा है। उनका जन्म स्थान। लेकिन राम अपनी जन्मभूमि में बेदखल हैं। एक बदशक्ल टेंट में पनाह लिए हैं, जिनकी कथा आपसे सुनकर लाखों श्रोता श्रद्धा से भर जाते हैं। कभी राम के तलगाजरडा पर भी कुछ कहिए। दो शब्द!
मैंने दो दिन तक एक कागज पर घुमा-फिराकर यह प्रश्ननुमा जिज्ञासा उनके समक्ष भेजी। उन्होंने दूसरे कई ऐसे प्रश्न ही लिए जिनके विषय जीवन से जुड़े थे। कोई दुखी है। कोई निराश है। किसी ने कथा में कोई संकल्प ले लिया। शिव, विष्णु या राम से जुड़ा कोई प्रश्न। संभव है मेरी तरह और मानसप्रेमियों ने भी वर्तमान के कुछ प्रश्न लिख भेजे हों। लेकिन उन्होंने ऐसा कोई सवाल नहीं उठाया। आखिरी दिन कथा की पूर्णाहुति पर जब राम अयोध्या लौटे और एक व्यक्ति के संदेह पर सीता को निकाला गया तब बापू ने कहा कि तुलसी रामचरित मानस में इस प्रसंग की चर्चा नहीं करते। तुलसी क्या इशारा कर रहे हैं? तुलसी विवादों से बचना चाहते हैं। वे संवाद चाहते हैं, विवाद नहीं। सीता का त्याग एक विवादास्पद प्रसंग है। तुलसी अपने मानस में इससे बचे।
मुझे लगा कि बापू का इशारा ऐसे सब सवालों की तरफ था, जो हमारे सामने हैं। आज की अयोध्या में एक फटेहाल टेंट में विराजित राम का प्रश्न। एक हजार साल के दमन के दाैर में आहत सभ्यता के बेचैन कर देने वाले अनगिनत सवाल। सत्तर साल से सेकुलर सिस्टम में पनपी गाजरघास में घुमड़ते सवाल। नौ दिन में उन्होंने अपनी ओर से कभी कलयुग के भारत काे शायद ही स्पर्श किया हो। किसी ने उस दिशा में मोड़ने की कोशिश सवालों के जरिए की भी हो तो वे बचकर निकले।
मैं कई बार अयोध्या गया हूं। करोड़ों भारतीयों के आराध्य भगवान राम को उस टेंट में देखना वाकई एक तकलीफदेह अनुभव की तरह रहा। मैंने बापू को उसी भावुक धरातल पर पूरी श्रद्धा से सुना। त्रेतायुग में जगमगाते राम उनकी कथाओं का केंद्र हैं। तुलसी भी, जिन्होंने लोकभाषा में राम की कथा कही और भारतीयों के अंतस में उतार दी। हजार साल के मुस्लिमकाल में हजारों मंदिर ध्वस्त किए गए। अकेले एक निहत्थे तुलसी की एक कविता ने राम की प्रतिष्ठा पीढ़ियों के मानस में कर दी। 
 
बापू के वचन त्रेतायुग की चमकदार अयोध्या की झिलमिलाती झांकी से होकर तुलसी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर ही केंद्रित रहे। मुझे आज की उजाड़ अयोध्या रोज ही याद आती रही। बापू वहां तक भूलकर भी आए नहीं। राम के तलगाजरडा पर बोलना एक सर्वमान्य और विश्वप्रसिद्ध वक्ता के लिए नुकसानदेह हो सकता है। सहज और संतुलित वक्ता की छवि टूट सकती है, क्योंकि अाज की अयोेध्या पर आप क्या कहेंगे? मंदिर का उल्लेख किए बिना कैसे रहेंगे। इसलिए बेहतर है कि अच्छे शायरों के कलाम सुनाए जाएं, अल्लाह, पैगंबर,जीसस, निजामुद्दीन औलिया और अमीर खुसरो के किस्सों के सहारे थोड़ा व्यापक हो लिया जाए, दार्शनिक अर्थ देने वाले फिल्मों के चुनिंदा गीतों को गा लिया जाए। मानस के विष्णु का एक अर्थ यह भी है-जो व्यापक हो, विशाल हो। आकाश भी जिसमें समा जाए। मानस विष्णु ही उनका इस कथा में केंद्रीय विषय था।

Tuesday, 21 February 2017

मेरा राष्ट्रवाद

  भारत एक राष्ट्र के रूप में मुझे गर्व से भरता है। यह ऐसा देश है, जो अपने हर हिस्से और हर हरकत में बेजोड़ है। मैं खुद को खुशनसीब मानता हूं, जो आजाद भारत में पैदा हुआ। मेरे कई पुरखे गुलाम सदियों की उथल-पुथल में जाने कहां-कहां से बेदखल होते हुए भटके। उनके लिए भारत के क्या मायने रहे होंगे? मगर चार पीढ़ियाें के संघर्ष के बाद आजादी की रोशनी में आए भारत की याददाश्त में हजारों साल पुरानी सभ्यता और संस्कृति के जगमगाते किस्से थे। यह मामूली बात नहीं थी। यह ऐसी विरासत थी, जिसने भारत को भरोसे से भरा। भरोसा इस बात का कि वह किसी से कम नहीं है।
मैं मानता हूं कि राष्ट्रवाद की कोई एक परिभाषा नहीं हो सकती। हरेक के लिए इसके मायने अलग हो सकते हैं। नजरिया दूसरा हो सकता है। मगर मूल में राष्ट्र ही होना चाहिए। यह अनिवार्य शर्त है। निर्विवाद, संदेह और सवालों के परे सिर्फ एक राष्ट्र। भारत ने अपने निकट अतीत मंे जो भोगा है, उसे देखते हुए यह देश हमसे कुछ अतिरिक्त की अपेक्षा करता है। और यह अपेक्षा गैर वाजिब नहीं है। भारत में पैदा होने के कुछ खास मायने हैं। यह धरती के किसी भी हिस्से में पैदा होने जैसा संयाेग नहीं है। चमत्कारिक रूप से इस धरती पर संसार की चंद जीवित और पुरातन परंपराएं जहां बची रह पाईं, उनमें भारत सबसे ऊपर है। भारतीय लोक संस्कृति के प्रसिद्ध अध्येता डॉ. कपिल तिवारी इसे जोर देकर पुरातन की बजाए सनातन कहते हैं। मुझे लगता है यही ज्यादा सही है। हम पुरातन नहीं, सनातन हैं। इसलिए प्रासंगिक हैं।
जिद और झक में नक्शे पर चंद लकीरें खींच देने भर से कोई राष्ट्र नहीं बन जाते। आजादी के साथ हुए बटवारे के बाद हमने यह कहकर संतोष किया कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है। मगर कश्मीर का जो हिस्सा लकीर के उस तरफ है, उसका क्या? इसी लकीर के इस तरफ पंजाब का एक टुकड़ा है और दूसरी तरफ दूसरा, उसका क्या? वे भी तो हजारों साल से उसी पुरातन और सनातन सिलसिले का हिस्सा रहे हैं। आज वे किस राष्ट्र को संबोधित हैं? एक दिन कागजों पर नए नक्शे बन गए। लकीरें खिंच गईं। जमीन पर खूनखराबे और मारकाट मची। एक राष्ट्र खंडित हो गया। दूसरा पैदा हो गया। लेकिन इन सिरफिरी लकीरों से पैदा हुए उस तथाकथित राष्ट्र की क्या गत हुई? वहमी विचार पर जड़ों से उखड़ी एक जमात!
राष्ट्र अपनी गौरवशाली परंपराओं से बनते हैं। इसमें पीढ़ियां लगती हैं। वे जिंदगी को बेहतर, अासान और उद्देश्यपूर्ण बनाने में अपनी सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा लगाती हैं। वे कुछ ऐसा देकर जाती हैं, जो आने वाली नस्लों के लिए प्रेरक, याद करने और गर्व करने लायक हो। वह कुछ भी हो सकता है। मसलन, कोई जीवन और जगत की उलझी हुई पहेली को सुलझाएगा, नई और मौलिक अवधारणाएं देगा। कोई एक का खंडन करेगा, दूसरा विचार पेश करेगा। कोई मनुष्य की चेतना और जीवन स्तर को ऊंचा उठाने की नई-नई तरकीबें खोजेेगा। नए धर्म की नींव रखेगा। नई सोच, नया नजरिया देगा। कोई यादगार कविता लिखेगा। कोई गणित के सूत्र रचेगा। काेई अंतरिक्ष में ताकझांक कर ग्रहों की गणना करेगा तो कोई प्रकृति के प्रश्नों के उत्तर ढूंढेगा। कोई अजंता-एलोरा बनाएगा। कहीं बामियान के पहाड़ों से बुद्ध प्रकट किए जाएंगे। कोई तक्षशिला, नालंदा और विक्रमशिला की नींव रखेगा। कोई कोणार्क और खजुराहो में चौंकाएगा। कहीं कोई चौबीस कैरेट का विजयनगर चमकाएगा। कोई संगीत तो कोई नाटक और नृत्य की विधाएं लेकर आएगा। यह सिलसिला सदियों तक एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलता ही चला जाएगा। अब आप कल्पना कीजिए कि जिस जमीन पर यह होगा, उसकी शक्ल आखिरकार कैसी होगी?
भारत की कहानी में यही सब है और भरपूर है। पांच हजार साल के ज्ञात सिलसिले में हर हुनर के लाजवाब किरदारों की कभी खत्म होने वाली चमकदार कतार, कारनामे और शानदार सबूत हमारे पास हैं। जब अंग्रेज यहां आए तो यही वह चीज थी, जिसने भारत के प्रति चंद जिज्ञासु अफसरों को हैरत से भरा। मैं सर विलियम जाेंस का नाम सबसे ऊपर रखूंगा। बीस-पच्चीस साल के ऐसे युवा अंग्रेज, जो यहां आज के लाटसाबों की तरह ठाट से सिर्फ अफसरी करने नहीं आए थे यहां की आबो-हवा ने उन्हें गजब की रचनात्मक ऊर्जा से भर दिया। उन्हांेने यहां की भाषा सीखी, शास्त्र पढ़े, देश के कोने-कोने में वीरान और उजाड़ खंडहरों की खोज में जिंदगी लगा दी, शिलालेखों में इस देश के वैभवशाली अतीत के मजबूत सबूत ढूंढे, चप्पे-चप्पे में खुदाइयां कीं और नए-नए रहस्य उजागर किए। वे रहस्य जिन पर सदियों की गुलामी की धूल चढ़ी थी। जो हमारी याददाश्त से गुम थे और मूर्खतापूर्ण लगने वाले किस्से कहानियां बनकर रह गए थे।

पूरी उन्नीसवीं सदी ऐसे अनगिनत अंग्रेजों की जबर्दस्त जिज्ञासा और खोज से भरी है, जिसने भारतीयों को भारत का भूला-बिसरा परिचय याद दिलाया अपने अथक परिश्रम और समर्पण से एक साफ-सुथरा आइना हमें दिया, जिसमें हम अपनी शक्ल ढंग से देख सकते थे। वर्ना तब हम सारनाथ के स्तूपों की ईंटें खोदकर वाराणसी में एक नया मोहल्ला बना रहे थे, नालंदा के टीलों पर खैनी खा-चबाकर थूक रहे थे और सांची की महान विरासत को जंगलों में खो चुके थे। ये वो कोशिशें थीं, जिसने आजादी की लड़ाई में दाखिल होने के पहले भारत को भारत याद दिलाया। मैं समझता हूं कि एक बदकिस्मत मुल्क के लिए यह बड़ी सौगात थी। उन अफसरों के योगदान को देखकर मुझे लगता है जैसे हमारे ही पुरखे उनके रूप में लौटकर भारत आए हों, हमें वापस यह बताने के लिए कि बच्चों देखो, भारत क्या है?
उसी दौरान यह देश 90 साल के विकट स्वाधीनता संघर्ष से गुजरा। तब भारत की कोख से कमाल के किरदार पैदा हुए। स्वामी विवेकानंद मुझे सबसे पहले याद रहे हैं, जिन्होंने पश्चिम को सबसे पहले सबसे ऊंचे स्वर में बताया कि भारत और उसकी नियति क्या है? विवेकानंद का तेवर राष्ट्रवाद की सर्वश्रेष्ठ परिभाषा है। उनका हर भाषण, हर उत्तर, हर शब्द एक राष्ट्र के रूप में भारत की कहानी को महान अर्थ देता है। उसकी जरूरतों को बताता है। उसकी अपेक्षाएं उजागर करता है। कमियों को रेखांकित करता है। वे आधुनिक भारत के प्रथम प्रवक्ता हैं, जिन्हें भारत की नियति ने ही एक खास काम के लिए इतिहास के एकदम सही मोड़ पर पैदा किया। वे बहुत थोड़े समय जीए, लेकिन बहुत विराट देकर गए। उनके बिना मेरे राष्ट्र की गौरवशाली कहानी का सबसे चमकदार पन्ना बेरौनक ही रह जाता।
सातवीं से दसवीं सदी में बेरहम अरब और तुर्क हमलावरों के दाखिल होने तक भारत नक्शे पर खिंची रेखाओं की शक्ल में आज जैसा एक स्पष्ट राष्ट्र नहीं था। लेकिन इस भू-भाग की सांस्कृतिक परिभाषा वेदों की ऋचाओं में मौजूद है। 23 सौ साल पहले सिकंदर के हमले के समय तक्षशिला में आचार्य चाणक्य के मन में एक राष्ट्र के रूप में भारत के भविष्य को लेकर ही तो चिंताएं और सवाल कौंधे थे, जो घनानंद की अपमान भरी राजसभा तक उन्हें ले आए थे। राष्ट्र भारत की जागृत चेतना में तब भी मौजूद था। भारत को उसकी महान सांस्कृतिक परंपराओं ने एक रूप दिया था।
राज्य विस्तार के संघर्ष में एक दूसरे से उलझे और लगातार लड़ते रहने वाले शासक भी जीत के बाद सिर्फ संसाधनों पर कब्जे कर अपने अहंकार की तुष्टि करते थे। वे अपनी समान संस्कृति के एक जैसे मान बिंदुओं को कभी नष्ट नहीं करते थे। तो एक तरफ राज्यों की सीमाएं बनती, बिगड़ती रहती थीं और दूसरी तरफ हर राजवंश में कुछ शासक ऐसे भी होते थे, जो कुछ गजब की चीजंे जोड़ जाते थे। और इस तरह हजारों साल की यात्रा में भारत हर रंग-रूप में खिलता-खिलखिलाता रहा। हर पीढ़ी को अपने जीते-जी गर्व करने लायक एक महान विरासत अपने हिस्से में जन्म से मिली।
सातवीं सदी में सिंध और ग्यारहवीं सदी में दिल्ली पर कब्जे के बाद हालात बदले। भारत एक हजार साल लंबी इतिहास की अंधेरी और भयावह सुरंग में धकेल दिया गया। यह गुलामी की भयावह यातना से भरी सुरंग थी। राष्ट्र के रूप में भारत की चेतना को आघात पहुंचाने वाली, क्योंकि वे हमलावर भारत की आत्मा से परिचित थे, होना चाहते थे। भारत की कला, संस्कृति और स्मारक उनमें उन्नीसवीं सदी के नौजवान अंग्रेज अफसरों की तरह जिज्ञासाओं से नहीं भर रहे थे। वे सूखे रेगिस्तानों से आए दुर्दांत लुटेरे थे, िजनके सिर पर खून सवार था और वे किसी भी हद तक जा सकते थे। वे इस वहम में थे कि वे सब कुछ जानते हैं और उन्हें संसार का सर्वश्रेष्ठ ज्ञान मिल चुका है। इसलिए वेद या बुद्ध में उनकी दिलचस्पी का कोई सवाल ही नहीं था। वे बहुत आसानी से नालंदा को जलाकर राख करने का कलेजा रखते थे। वे ऐसे ही विजेता थे, जो आतंक और डर के सहारे बाकी दुनिया पर कत्लेआम और कब्जा करने निकले थे। इनकी चपेट में आकर जिन्होंने अपनी पहचानें बदलीं, वे और ज्यादा घातक होते गए। अपनी जड़ों से भटकी और दूर तक फैली एक नस्ल अपने ही राष्ट्रों के लिए आत्मघाती बनती चली गई।
इसलिए जब विवेकानंद जैसे किरदार भारत की घायल सदियों में दूर-दूर तक फैली राख और धुएं के पार देखते हैं तो भारत के असली परिचय तक पहुंचते हैं। उन्हंे भारत की आत्मा का असली अहसास होता है। तब एक दिन कन्याकुमारी में समुद्र के भीतर आखिरी चट्टान पर वे संसार को कुछ बताने को बेचैन हो उठते हैं। नियति जल्दी ही शिकागो की एक सभा में उन्हें वह मौका देती है। और एक सुबह दुनिया को पहली बार पता चलता है कि भारत के मायने क्या हैं?
इस्लाम के बिना यह चर्चा अधूरी और बेमानी होगी। मैं यहां टर्की के एक महापुरुष कमाल मुस्तफा पाशा का जिक्र करना चाहूंगा। कमाल ने जो किया, मेरी नजर में एक आहत राष्ट्र के खोए हुए गौरव को हासिल करने के लिए एक बड़ी नजीर है। टर्की एक इस्लामी मुल्क है। लेकिन पाशा की नजर में वह इस्लाम के पहले भी कुछ था। उनकी अपनी परंपराएं थीं। भाषा थी। संस्कृति थी। यह बात और है कि इस्लाम की सदियों की सोहबत में सब कुछ धुंधला गया था। जब इस्लाम के अंधड़ अपनी चपेट में आने वाले हर भूभाग और वहां के बाशिंदों की शक्लें और पहचान हमेशा के लिए बदल रहे थे तब टर्की भी अपनी जड़ों से टूटकर तबाह हुआ। बीसवीं सदी की पहली चौथाई में इस्लाम का आखिरी खलीफा यहीं से अपनी हुकूमत चला रहा था। कमाल मुस्तफा पाशा के तस्वीर में आते ही इस मुल्क ने सबसे पहले उठकर अपने ऊपर चढ़ी सदियों की धूल झटकारी और पहली ही अंगड़ाई में एक राष्ट्र के रूप में अपनी गुमशुदा याददाश्त पर जोर डाला।
पाशा ने फौरन कई कदम एक साथ उठाए। उन्होंने टर्की को अपनी मूल पहचान की तरफ मोड़ा। भाषा का शुद्धिकरण इस हद तक किया कि अरबी-फारसी के शब्दों को बीन-बीनकर हटाया गया। एक मजहब के रूप में उन्हांेने इस्लाम को कायम रखा मगर अपने राष्ट्र की शर्तों पर। मसलन, हम कुरान अरबी में नहीं, तुर्की में पढ़ेंगे। उन्होंने अल्लाह शब्द तक का तुर्की में तर्जुमा किया। कहा कि हम नई मस्जिदें नहीं बनाएंगे। एक सेकुलर निजाम में पुरानी मस्जिदें, ऐतिहासिक इमारतें होंगी, जहां सब -जा सकेंगे। जुमे की बजाए संडे को छुट्टी रखेंगे। सार्वजनिक स्थानों पर मजहबी लिबास पर बंदिश रहेगी। कुछ कट्टरपंथियों ने कुरान के अनुवाद की मुखालिफत की तो पाशा का जवाब था-वो कैसा अल्लाह है जो सिर्फ अरबी में समझेगा और वही बात तुर्की में नहीं। पाशा ने पंद्रह साल में एक राष्ट्र की कायापलट कर दी। कृतज्ञ राष्ट्रवादी नागरिकों ने आदर से उन्हें अपना अतातुर्क कहा। अतातुर्क मतलब राष्ट्रपिता!
अब आप इस अर्थ में आप भारत को देखने की हिम्मत जुटाइए। हमारे यहां क्या चला?
जब टर्की में पाशा अपने मुल्क की छाती पर लदे पड़े खलीफा को रफा-दफा कर रहे थे तब महात्मा गांधी यहां के मुसलमानों को खुश करने के लिए खिलाफत आंदोलन का प्लान कर रहे थे। भारतीय मुसलमानों की जिंदगी को बेहतर करने का इससे बेहतर विजन उनके पास नहीं था और इसी पर आजाद भारत की सेकुलर सरकारों ने आयतों की तरह अमल किया। खुश करने के लिए तात्कालिक और सस्ते उपाय, जिसने एक जिंदा कौम को वोट बैंक का अपमानजनक तमगा दिया। सरदार पटेल ने जब सोमनाथ के सीने से इतिहास का अपमानजनक दाग धोकर भारत के भाल पर सम्मान का त्रिपुंड लगाया तो यह कारनामा सबसे पहले पंडित नेहरू को ही रास नहीं आया। वे तो डॉ. राजेंद्र प्रसाद तक से खैर खाकर ही बैठ गए, जो सोमनाथ के समारोह में बतौर राष्ट्रपति शान से शरीक हुए। जाने-माने पत्रकार दुर्गादास ने अपनी किताब कर्जन टू नेहरू में उस विकट दौर की आंखों देखी लिखी है। किसी भी राष्ट्र के जीवन में ये छोटी, मामूली और भूलने योग्य घटनाएं नहीं हैं। खासकर तब जब वह राष्ट्र एक नई जिंदगी शुरू करने जा रहा हो। और इनका नतीजा क्या हुआ? तो सत्तर साल में वर्ग विशेष की हालत में कोई बदलाव आया और ही वे भारत की रूह से जुड़ पाए। उनमें पराएपन का असंतोष बना ही रहा, जो आए दिन के टकराव की जड़ बनकर जम गया। पाकिस्तान में पैदा हुए मशहूर लेखक तारेक फतह खुद को अपने पंजाबी पूर्वजों से जोड़कर हिंदुस्तानी कहने में गर्व महसूस करते हैं। इस्लामी हमलावरों से अपना इतिहासजोड़ने वाली मुस्लिम मानसिकता पर उन्हें सख्त ऐतराज है।
एक भावुक भारतीय के रूप में भारत के टुकड़े मुझे बेचैन करते हैं। अयोध्या में भगवान राम का एक टेंट में पनाह लेना मुझे अफसोस से भरता है। वाराणसी में प्राचीन विश्वनाथ मंदिर का नंदी अपने शिव की बाट जोह रहा है। उसे नहीं पता कि यहां वक्त ठहर गया है। तब मैं सोचता हूं कि यह कैसा राष्ट्र है, जिसके देव और महादेव ही अपनी जगह से बेदखल हैं। बचा-खुचा भारत अपनी सनातन सांस्कृतिक पहचान की बुनियाद पर एक नई शुरुआत कर सकता था। 1947 में बहुत आसान था कि हम कुछ पुराने दाग धो लेते। कुछ नए रास्तों पर निकलते। बटवारे के हिसाब-किताब में चीजें ज्यादा बेहतर ढंग से साफ हो सकती थीं। अलग से सेकुलर होने का झंडा सिर पर टांगने की इसलिए जरूरत नहीं थी क्योंकि भारत अपने स्वभाव और अपने चरित्र से सेकुलर ही है। वह अड़ियल होता तो किसकी हिम्मत थी कि सिंध के पार कभी कोई आंख तिरछी करके भी देखता। 17 बार हमले और दिल्ली पर कब्जे तो सपने में भी संभव नहीं होते।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी भी विचार को धर्म या संस्कृति की शक्ल लेने में चंद सदियों का वक्त नाकाफी है। इसमें हजारों साल और पीढ़ियां खपती हैं। विवादों और असहमतियों को पचाने की अथाह क्षमता हमेशा जरूरी है। भारत ने हजारों साल की अपनी यात्रा की शुरुआत में ही यह सीख लिया था कि पूरी दुनिया एक कुटुंब है। जीओ और जीने दो। सब सुखी हों। सब स्वस्थ हों। किसी के हिस्से में कोई कष्ट आए। महान पुरखों की यही विरासत भारत को दुनिया में सबसे अलग करती है। यह देश हमसे अपने सर्वश्रेष्ठ का हकदार है। यह जरूरी है कि हम इसे समझने का बोध पैदा करें। वह आंख हमारे पास हो, जो समय के पार भारत को देख और समझ सके। इसके लिए इतिहास बोध होना जरूरी है, जो हमेशा से हमारा सबसे कमजोर पहलू रहा है। हमें हमारा ही पता दूसरे बताते आए हैं!
संक्षेप में मैं कहूंगा, सांसारिक और आध्यात्मिक क्षेत्र की हर गहराई और ऊंचाई को छूते हुए भारत ने सांस्कृतिक-आर्थिक समृद्धि के कई चमकदार दौर देखे। फिर वह अपनी ही दुनिया में मस्त रहा। जैसे उसे कुछ और पाना शेष नहीं था। यह उसकी मस्ती का ही आलम है कि नालंदा के हत्यारे बख्तियार खिलजी के नाम पर नालंदा की लाश के पास बख्तियारपुर नाम का शहर आज भी आबाद है। इस मस्ती का क्या कहिए कि बहराइच में महमूद गजनवी के हमलावर भांजे सालार मसूद की कब्र कब मन्नत पूरी करने वाली एक दरगाह बन गई, किसी को कानो-कान खबर हुई।
ऐसे एक दरियादिल राष्ट्र के रूप में यह अजूबा भी सिर्फ भारत में ही मुमकिन है।

सरदार सरोवर का सार संक्षेप

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